Saturday, October 28, 2017

भूख का इंकलाब!


जब तुम दलीलें दे रहे थे 
भूख से नहीं मर रहे बच्चे, रिक्शा चालाक और मजदूर,
तब सड़क पर खड़े एक भिखमंगे ने 
फेंक दिया था खोलकर 
अपने शरीर पर बचा 
एक मात्र अधोवस्त्र,
खड़ा हो गया था नंगा 
शासन के ख़िलाफ़!
कि नंगे का सामना 
नंगा ही कर सकता है,
भूख भूखे को ही जिबह करती है,
लील लेती है बेरोजगारी 
मासूम युवा को 
फंदे की शक्ल में.
भूख से आदमी नहीं मरता;
मरती हैं अंतड़ियां,
सूख जाता है रक्त 
गायब हो जाता है शरीर का पानी,
तब मौत का कारण 
कुछ और दर्ज किया जाता है,
'भूख' बिलकुल नहीं। 

तुम सच कहते हो मंत्री महोदय!
आज तक एक भी मौत भूख से नहीं हुई,
मौतें हुयी हैं तुम्हारे नंगेपन से,
जब मर गया तुम्हारा ज़मीर,
अंधी व्यवस्था ने निगल ली ईमानदारी,
आदमी भेड़-बकरियों की तरह खड़ा हो गया लाइन लगाकर,
बच्चों ने जान दे दी 
तुम्हारी वफादारी देखकर,
मशालें जल गयीं इंकलाब की,
जी हां, ये भूख का इंकलाब है!!

(Image credit google)



20 comments:

  1. भूख से मर रही हमारी आनेवाली नस्लें और इन राजनेताओं को मौत में भी सियासत नज़र आती हैं..... बहुत जीवंत कविता लिखी है आपने अपर्णा जी

    ReplyDelete
  2. भूख से मर रही हमारी आनेवाली नस्लें और इन राजनेताओं को मौत में भी सियासत नज़र आती हैं..... बहुत जीवंत कविता लिखी है आपने अपर्णा जी

    ReplyDelete
  3. आपका सादर आभार शकुन्तला जी

    ReplyDelete
  4. आज की व्यवस्था पर बहुत ही सटीक व्यंग किया आपने।

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी, आभार ज्योती दी.

      Delete

  5. भूख

    मेरा गीत चाँद है न चांदनी है आजकल, ना किसी के प्यार की ये रागिनी है आजकल|

    मेरा गीत हास्य भी नहीं है माफ़ कीजिये, साहित्य का भाष्य भी नहीं है माफ़ कीजिये|

    मै गरीब के रुदन के आंसुओ की आग हूँ, भूख के मजार पर जला हुआ चिराग हूँ|

    मेरा गीत आरती नही है राज पट की, जगमगाती आत्मा है सोये राज घट की|

    मेरा गीत झोपडी के दर्दो की जुबान है, भुखमरी का आइना है, आंसू का बयान है|

    भावना का ज्वार भाटा जिये जा रहा हू मै, क्रोध वाले आंसुओ को पिए जा रहा हू मै|

    मेरा होश खो गया है लहू के उबाल में, कैदी होकर रह गया हू, मै इसी सवाल में|

    आत्महत्या की चिता पर देख कर किसान को, नींद कैसे आ रही है देश के प्रधान को||

    सोच कर ये शोक शर्म से भरा हुआ हू मै, और मेरे काव्य धर्म से डरा हुआ हू मै |

    मै स्वयं को आज गुनेहगार पाने लगा हू, इसलिए मै भुखमरी के गीत गाने लगा हू|

    गा रहा हू इसलिए की इन्कलाब ला सकूं | झोपडी के अंधेरों में आफताब ला सकूं|

    इसीलिए देशी और विदेशी मूल भूलकर, जो अतीत में हुई है भूल, भूल कर|

    पंचतारा पद्धति का पंथ रोक टोक कर, वैभवी विलासिता को एक साल रोक कर|

    मुझे मेरा पूरा देश आज क्रुद्ध चाहिए, झोपडी की भूख के विरुद्ध युद्ध चाहिए|

    मेहरबानों भूख की व्यथा कथा सुनाऊंगा, महज तालियों के लिए गीत नहीं गाऊंगा|

    चाहे आप सोचते हो ये विषय फिजूल है, किंतु देश का भविष्य ही मेरा उसूल है|

    आप ऐसा सोचते है तो भी बेकसूर है, क्योकिं आप भुखमरी की त्रासदी से दूर है|

    आपने देखि नही है भूखे पेट की तड़प , भूखे पेट प्राण देवता से प्राण की झड़प|

    मैंने ऐसे बचपनो की दास्ताँ कही है, जहाँ माँ की सुखी छातियों में दूध नही है|

    जहाँ गरीबी की कोई सीमा रेखा ही नही, लाखो बच्चे है जिन्होंने दूध देखा ही नहीं|

    शर्म से भी शर्मनाक जीवन काटते है वे, कुत्ते जिसे चाट चूके, झुटन चाटते है वे|

    भूखा बच्चा सों रहा है आसमान ओढ़ कर, माँ रोटी कम रही है, पत्थरों को तोड़ कर|

    जिनके पाँव नंगे है,और तार तार है, जिनकी सांस सांस साहूकारों की उधार है|

    जिनके प्राण बिन दवाई मृत्यु के कगार है, आत्महत्या कर रहे है भूख के शिकार है |

    बेटियाँ जो शर्मो हया होती है जहान की, भूख ने तोडा तो वस्तु हो गई दुकान की|

    भूख आत्माओ का स्वरूप बेच देती है, निर्धनों की बेटियों का रूप बेच देती है|

    भूख कभी कभी ऐसे दांव पेंच देती है, सिर्फ 2000 में माँ बेटा बेच देती है|

    भूख आदमी का स्वाभिमान तोड़ देती है, आन बान शान का गुमान तोड़ देती है|

    भूख सुदमाओ का अभिमान तोड़ देती है, महाराणा प्रताप की भी आन तोड़ देती है|

    किसी किसी मौत पर धर्म कर्म भी रोता है,क्योंकि क्रिया क्रम का भी पैसा नहीं होता है|

    घरवाले गरीब आंसू गम सहेज लेते है, बिना दाह संस्कार मुर्दा बेच देते है|

    थूक कर धिक्कारता हू , मै ऐसे विकास को, जो कफ़न भी देना पाए गरीबों की लाश को|

    भूख का निदान झूटे वायदों में नही है, सिर्फ पूंजीवादियो के फायदे में नही है|

    भूख का निदान कर्णधारों से नही हुआ, गरीबी हटाओ जैसे नारों से नही हुआ|

    भूख का निदान प्रशाशन का पहला धर्म है, गरीबों की देखभाल सिंहासन का धर्म है|

    इस धर्म की पलना में जिस किसी से चुक हो, उस के साथ मुजरिमों के जैसा ही सलूक हो|

    भूख से कोई मरे ये हत्या के समान है, हत्यारों के लिए मृत्युदंड का विधान है|

    कानूनी किताबो में सुधर होना चाहिए, मौत का किसी को जिम्मेदार होना चाहिए|

    भूखो के लिए नया कानून मांगता हु मै, समर्थन में जनता का जूनून मांगता हु मै|

    ख़ुदकुशी या मौत का जब भुखमरी आधार हो, उस जिले का जिलाधीश सीधा जिम्मेदार हो|

    वह का एम् एल ए , एम् पी भी गुनेहगार है, क्योंकि ये रहनुमा चुना हुआ पहरेदार है|

    चाहे नेता अफसरों की लॉबी आज क्रुद्ध हो, हत्या का मुकदमा इन्ही तीनो के विरुद्ध हो|

    अब केवल कानून व्यवस्था को रोक सकता है, भुखमरी से मौत एकदिन में रोक सकता है|

    आज से ही संविधान में विधान कीजये, एक दो कोल्लेक्टरो को फंसी तंग दीजिये|

    कवि : हरी ओम पवार

    ReplyDelete
  6. आदरणिया अनुजा अपर्णा वाजपेयी मैने ऐक बार बताया था की भूख का निदान श्रद्देय कवि हरीओम पवाँर जी ने बताया आज उनकी वो रचना कमेंट मे डाली है आपको

    ReplyDelete
    Replies
    1. आदरणीय अग्रज, एक महान कवि की कविता को मेरे साथ साझा करने के लिये सादर आभार. आदरणीय हरिओम पंवार जी की कविता भूख का समाजशाषत्र है और भूख से होने वाली मौतों के लिये सही न्याय व्यवस्था की मांग करती है.
      कंही न कंही हम सब उनके गुनाहगार हैं जिन्हे दो वक्त रोटी भी मयस्सर नहीं होती.
      आपका बहुत आभार

      Delete
  7. मशालें जल गयीं इंकलाब की,
    जी हां, ये भूख का इंकलाब है!!

    बहुत ही ओजमयी रचना अपर्णा जी। बेबाक, बेलाग और सीधी बात कहना एक हुनर है जो हर रचना कार को नही आता। बहुत प्रभावित करती सार्थक कविता।

    ReplyDelete
    Replies
    1. अमित जी जब दिल पर चोट लगती है तो गुस्सा ऐसे ही फूट padta है.
      मेरी कविता समय की चोट है, समाज के जख्म का अक्स है और हर मजलूम के अन्तस की आग है.
      उत्साहवर्धन के लिये सादर आभार

      Delete
  8. तुम सच कहते हो मंत्री महोदय!
    आज तक एक भी मौत भूख से नहीं हुई,
    मौतें हुयी हैं तुम्हारे नंगेपन से,
    जब मर गया तुम्हारा ज़मीर,
    अंधी व्यवस्था ने निगल ली ईमानदारी,
    वाह!!!!!
    बेबाक और सटीक प्रस्तुति
    अद्भुत,लाजवाब,अविस्मरणीय.....

    ReplyDelete
    Replies
    1. आदरणीय सुधा जी,
      आप की इस उत्प्रेरक प्रतिक्रिया के लिये हृदयतल से आभार.
      कृपया समय समय पर मार्गदर्शन करती रहें.
      सादर

      Delete
  9. झकझोरने वाली रचना है आपकी ...
    सच के सामने बेबस हो जाते हैं सब ... कोई ये कहे की आज भूख का कहर नहीं वो सिर्फ सच से आँखें मूँद रहा है ... सटीक, सार्थक और सामयिक रचना है ....

    ReplyDelete
    Replies
    1. नासवा जी ब्लोग पर आप का आना उत्साह से भर देता है.प्रतिक्रिया देने के लिये शुक्रिया.

      Delete
  10. आपकी लिखी रचना  "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 1नवम्बर 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    ReplyDelete
    Replies
    1. आदरणीय पम्मी जी, आभार मेरी रचना को शामिल करने के लिये.
      सादर

      Delete
  11. प्रिय अपर्णा सामयिक समस्या बोध से भरी रचना व्यवस्था से आक्रांत मन का भावभीना उदगार है जिसमे संवेदना तो है ही -- कानून और व्यवस्था के ठेकेदारों को एक सार्थक फटकार भी है |'' नंगे का सामना एक नंगा ही कर सकता है '' क्या बात कहीं आपने!!!!!!! मन झझकोर गयी | समाज के विमर्श पर आपकी लेखनी का मंजा प्रवाह चकित कर देता है | ऐसी धारदार लेखनी की जरूरत आज समाज को है | आपके लेखन का प्रवाह अविरल हो !!!!!!!!!!

    ReplyDelete
  12. सही सियासत की जंग में बातें तो बड़ी-बड़ी होती हैं
    गरीबी तो दूर होती नही ,गरीब और गरीब ही होता चला जाता है ।कानून व्यवस्था पर तेज अच्छी फटकार है

    ReplyDelete
  13. नंगे का सामना नंगा ही कर सकता है ।
    लाजवाब प्रस्तुति !

    ReplyDelete