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Wednesday, September 20, 2017

कहानी- दाग ही तो है

ये कहानी पहले रचनाकार पर प्रकाशित हो चुकी है. नीचे इसका लिन्क दिया गया है. मेरे ब्लोग पर भी इसे  पढ़ सकते हैं.
http://www.rachanakar.org/2017/06/blog-post_19.html?m=1
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कहानी-
बहुत दिनों बाद आज जीन्स पहन कर घर से निकली थी। जीन्स में जो कम्फर्ट मिलता था वो किसी और ड्रेस में नहीं था। मन थोड़ा खुश था, उन्मुक्त , एक अलग एहसास। सोचा थोड़ी दूर पैदल चल कर अगले बस स्टाप से बस पर पकड़ूंगी। समय भी था । आज ऑफिस में ज्यादा काम भी नहीं था। बस स्टॉप पर पारूल मिल गयी मेरी कलीग। हम दोनों साथ साथ बस में चढ़े। बस में ज्यादा भीड़ नहीं थी। सामने की सीट खाली थी । हम दोनों बैठ गये। मैं बैठी ही थी कि पेट के नीचे थोड़ा मरोड़ सा हुआ। थोड़ी देर बाद मुझे कुछ डिस्चार्ज सा महसूस हुआ । मैं समझ गयी थी क्या हुआ लेकिन चार दिन पहले..... अब क्या करें। ब्लड शायद जीन्स की हद पार कर चुका था। मैं पेट को दबाकर बैठी थी इस उधेड़बुन में क्या करूं कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मैंने पारूल के कान में बताया तो उसका चेहरा देखने लायक था । वो क्या बताती उसकी तो जैसे जान अटक गयी थी। मेरा स्टॉप आने वाला था लेकिन सीट से उठूं कैसे ... सीट में दाग लगा हुआ तो... किसी ने देख लिया तो.... ऑफिस तक कैसे जाऊंगी... बैग में एक सैनिटरी पैड है लेकिन टॉयलेट तो कहीं नहीं है ।
बस स्टॉप आ गया था । मैंने पारूल से कहा पहले तू उतर फिर मैं खड़ी होऊंगी और हम दोनों जल्दी से बस से उतर जायेंगे। लेकिन हम खड़े ही होने वाले थे कि बस का कंडक्टर हमारी सीट के पास आ गया । कंडक्टर को देख कर ऐसा लगा मानों कोई भूत मेरे सामने आकर खड़ा हो गया हो। वो बोला ' मैडम आप का स्टॉपेज आ गया आप खड़ी हो जाइये ' और वो एक अन्य महिला को बुलाने लगा जो बहुत देर से खड़ी. थी।
कंडक्टर मेरी सीट के पास ही था मैं जैसे ही खड़ी हुयी उसकी नजर सीट पर चली गयी । सीट पर दाग लग चुका था पारूल जब तक मेरे पीछे खड़ी होती उसने मेरी जीन्स पर भी दाग देख लिया था। वो मुझे घूर रहा था। मेरी नज़र ऊपर नहीं उठ रही थी। लग रहा था जैसे ये पल आने के पहले मैं मर क्यूं नहीं गयी। वो मुझ पर चिल्ला रहा था । ऐ मैडम अपने आप को संभाल नहीं सकती तो घर के बाहर क्यों निकलती हो । अब ये सीट कौन धोयेगा तेरा बाप। इसीलिये लड़कियों को घर में बन्द कर के रखना चाहिये। बस में जैसे तूफान आ गया था। क्या हुआ क्या हुआ हर कोई जैसे सीट और मेरे कपड़े पर लगे दाग को देख लेना चाह रहा हो। इतनी शर्मिंदगी .....  ओह.... आज मैं घर से नकली ही क्यूं। ड्राइवर ने बस रोक दी थी। पारूल ने तब तक अपना स्कार्फ मेरी कमर पर बांध दिया था और बिना कुछ बोले मेरा हाथ पकड़कर जल्दी से बस से नीचे उतर गयी। बस आगे बढ़ गयी थी। लेकिन समस्या अब ऑफिस तक पहुंचने की थी। पारूल बोली तुम किसी तरह ऑफिस पहुंच कर टॉयलेट में घुस जाना और मैं तुम्हारे लिये नये कपड़े ले आती हूं आखिर दिन भर काम भी तो करना है। मैं जैसे भागते हुए ऑफिस पहुंची और भागकर टॉयलेट में घुस गयी । पहली बार टॉयलेट मां की गोद जैसा लगा जिसने पूरी दुनिया की नजरों से मुझे छुपा लिया था।
मैं उन दीवारों के भीतर रो रही थी अपने औरत होने पर । कहते हैं ये औरत की सबसे बड़ी ताकत हैं फिर थोड़ा सा दाग लग जाने पर इतनी बेइज्जती.....
क्या औरत होना गुनाह है या दाग लग जाना.... लेकिन पापा ने तो ऐसा कभी नहीं कहा था। हां  पापा ने ही मुझे जीवन का हर पाठ पढ़ाया था क्योंकि मेरी मां तभी भगवान को प्यारी हो गयी थीं जब मैं मात्र दो साल की थी। मुझे मेरे पापा ने अकेले पाला । दादी, बुआ , नानी किसी की भी सहायता के बिना। उनका कहना था अगर अकेली औरत बच्चे को पाल सकती है तो अकेला मर्द क्यों नहीं। उन्होंने मुझे खिलाना, पिलाना, नहलाना , धुलाना ,पढ़ना लिखना सब कुछ सिखाया। मेरे घर में सिर्फ हम दोनों ही रहते थे। मुझे पापा से कोई डर या झिझक नहीं थी । मैं उनके साथ सब कुछ शेयर करती थी। कभी ऐसा नहीं लगा कि ये बात पापा को बताऊं या नहीं । या उनसे कुछ छुपाना भी चाहिये।
मुझे याद है एक बार मैं घर के बाहर मैदान में क्रिकेट खेल रही थी अपने मोहल्ले के बच्चों के साथ । अंशुल ने आकर कहा देख निक्की तेरी स्कर्ट पर खून लगा है शायद तेरे पैर में चोट लग लग गयी है। मैं डरकर घर भागी थी कि पापा को पता चला कि मुझे चोट लग गयी है तो बहुत डाट पड़ेगी। मैं डर कर अपने कमरे में बन्द होकर बैठ गयी थी । चोट तो कहीं नहीं लगी थी लेकिन पेशाब की जगह से खून बह रहा था। मुझे लगा शायद अन्दर कहीं चोट लग गयी है। उस समय समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं । मैं कमरे में लगभग एक घंटे तक ऐसे ही बैठी रही। बाहर पापा के आने की आहट हुई । अब और डर लगा कि पापा पूछेंगे तो क्या बताऊंगी। पापा मुझे बाहर से आवाज दे रहे थे और मैं सुन कर भी कमरे से बाहर नहीं निकल रही थी। आखिर दरवाजा खोलना ही पड़ा। पापा जैसे ही अन्दर आये मैं उनसे चिपक कर जोर जोर से रोने लगी। वे बेहद डर गये थे आखिर मुझे क्या हो गया है। मुझे चुप कराने के बाद उन्होंने पूछा क्या हुआ है , चोट कैसे लगी , कहा लगी...... सवाल पर सवाल। मैं चुप थी । मैंने कहा पापा चोट नहीं लगी लेकिन बार बार खून बह रहा है ।
पापा शायद समझ गये थे। उन्होंने मुझे समझाया कि डरने की कोई बात नहीं है। ऐसा सब लड़कियों को होता है। उन्होंने मुझे घर से ही साफ कपड़ा लाकर पैन्टी में लगाकर दिया और बताया कि उसे कैसे पहनना है । फिर दुकान से लाकर मुझे सैनिटरी पैड दिया और कैसे इस्तेमाल करना है ये भी बताया । उस दिन उन्होंने मेरे लिये मेरी पसन्द का खाना बनाया और बड़े प्यार से मुझे खिलाया । शायद मुझे अच्छा एहसास करवाने के लिये। या मेरे शरीर में हो रहे परिवर्तनों का सामना करने के लिये और मुझे शारीरिक तथा मानसिक तौर पर तैयार करने के लिये। 
मेरे लिये ये नया अनुभव था और मेरे पापा के लिये भी। वे आज पूरी तरह से मेरी मां बन गये थे। उन्होंने मुझे समझाया कि ये दाग लग जाना साधारण बात है । उससे डरना नहीं चाहिये और ये गन्दा बिलकुल नहीं है। उन्होंने कभी नहीं बताया कि समाज के लिये औरत के शरीर में होने वाली ये छोटी सी अनिवार्य घटना इतनी बड़ी दुर्घटना होती है।
मैं जैसे जैसे बड़ी हो रही थी , समाज में घुल मिल रही थी वैसे वैसे मुझे भी ये दाग गन्दे लगने लगे थे। माहवारी होने पर चेहरे की उड़ी हुई रंगत देखकर पुरुष सहकर्मियों का फुसफुसाना कि लगता है मैडम अपने खास दिनों में हैं या आप आज छुट्टी क्यों नहीं ले लेती तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही जैसी सलाह मिलने पर खुद को भी तबियत खराब लगने लगती थी। अपनी सहेलियों की बातों , उनकी मम्मियों द्वारा दी गयी अपने स्त्रीत्व को सात परदों के भीतर छुपाने की सीख के असर के कारण ही आज मैं ऑफिस के टॉयलेट की दीवारों के बीच रो रही थी और पारूल का इन्तजार रही थी। 
लेकिन बस में जो हुआ था और मेरे भीतर जो डर , शर्मिंदगी थी वो मेरे पापा की सीख तो बिलकुल नहीं थी नहीं तो मैं कंडक्टर से कह न देती दाग ही तो है साफ हो जायेगा। बस में इतने लोग उल्टियां करते है वो कैसे साफ हो जाती है और भाग कर नहीं आराम से सबसे नजरें मिलाते हुए बस से उतर कर आती।

12 comments:

  1. हम महिलाएं सब कुछ भले ही भूल जाएँ
    दिन की गिनती कभी नही भूलती
    सादर

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  2. आदरणीय दीदी, आप सही कह रही हैं, लेकिन कई बार किसी स्वास्थ्य समस्या या हार्मोनल असमान्य्ता के कारण दिन आगे-पीछे हो जाते हैं. वैसे भी आजकल इतनी भाग-दौड़ और तनाव की वजह से इस तरह की समस्यायें देखने को मिल रही हैं. कहानी के द्वारा मै सिर्फ सामाजिक ताने-बाने में स्त्रियों के शरीर की एक आम घटना को कितने निम्न नज़रिये से देखा जाता है इस पर ध्यान दिलाना चाहती थी.

    दीदी आप का सुझाव मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण है. कृपया मार्गदर्शन करें. सहयोग की अपेक्षा के साथ.

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व अल्जाइमर दिवस : एल्जाइमर्स डिमेंशिया और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।v

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  4. हर्षवर्धन जी ,मेरी कहानी को स्थान व मान देने के लिये आपका बहुत बहुत आभार. मै अवश्य शामिल होऊंगी. सादर

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  5. बहुत अच्छा लिखा है आपने ....वाकई ऐसा क्यों....
    आजकल 11या 12 साल की बच्चियों को इसके लिए परेशान होते देखते है...बचपन जैसे छिन सा जाता है उनका.... क्या कभी इस बारे में लोगों की मानसिकता बदल पायेगी....
    लाजवाब प्रस्तुति....

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    1. सुधा जी, आप की प्रतिक्रिया ने मुझे हौसला दिया है.आप सब ही मेरे लिये प्रेरणा पुंज हैं.ब्लोग पर आने और प्रतिक्रिया देने के लिये आपका सादर आभार.

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  6. Aurat ki nimn mansikta se alag hatkar kuchh likha.
    Achha laga padhkar. Shayad inhi athak prayason k bute hi hum rudhivadi soch se mukti pa sakenge.
    Sadhuvaad ek utkrisht rachna k liye.

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  7. बहुत अलग लिखा है अपर्णा जी,एक प्राकृतिक देन को पर लोगों का नजरिया ऐसा ही संकीर्ण है।
    सत्य उजागर करती दमदार कहानी।
    शुभकामनाएँ आपको।

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  8. श्वेता जी इतनी सुखद प्रतिक्रया देने के लिए शुक्रिया. कई बार ऐसे मुद्दों पर लिखने में डर लगता है लेकिन हम नहीं कहंगे तो कौन कहेगा. आपकी शुभकामनाओं के लिए सादर आभार.

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  9. I am extraordinarily affected beside your writing talents, Thanks for this nice share.

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