Wednesday, September 13, 2017

स्कूल में बच्चे की ह्त्या - २ कवितायें


1.
ये जो तुमने मौत ओढ़ाई है मुझे
कितनी लाचार है अपनी कोशिशों में.
मै तो अब भी ज़िंदा हूँ तुम्हारे खून से सने हाथों में ,
तुम्हारे दुधमुहे बच्चे की बोतल में मेरी साँसे बंद हैं
और तुम्हारी पत्नी की मुस्कान :
ज़रा गौर से देखो! मेरी खिलखिलाहट नज़र नहीं आ रही.
स्कूल के बाथरूम में जब रेत रहे थे मेरी गर्दन;
तुम्हारी आत्मा तो तभी मर गयी थी
और मेरी चीखें
तुम्हारी नींद पर लगा दाग हैं.
बंद करो आँखे!
मेरी तड़पती देह तुम्हे सोने नहीं देगी
समझ नहीं आता तुमने क्यों किया ऐसा?
अपने बच्चों की मुस्काने खरीदने के लिए;
वो तो तुम अब भी नहीं देख पाओगे.
जब जब हँसेंगे तम्हारे बच्चे
मेरा खून से लथपथ ज़िस्म
तुम्हारी नज़र का पर्दा बन जाएगा.  

२.
चाँद तारे चुप है
तितलियों के रंग जाने कंहा खो गये
आज गुब्बारों की उड़ान मर गयी है
तुम्हारी फेवरेट चाकलेट कब से पड़ी है बिस्तर के नीचे
तुम्हारी रिमोट कार  कब से बेचैन है तुम्हारे लम्स के लिए......
ये इतना सन्नाटा क्योँ है?
सारे खिलौने गुमसुम से हैं
और बगीचे में खिले फूलों से खुशबू नदारद.......
तुमको आ जाना चाहिए था अब तक मेरे लाल!
देखो न हज़ार बार दरवाजे के बाहर झांक चुकी हूँ
आने दो ड्राइवर को
आज उसकी खबर लेती हूँ,
कोई इतनी देर करता है भला
बच्चे को घर पंहुचाने में.
मेरे बच्चे ज़ल्दी लौटना घर सही सलामत
जैसे गए थे..............
हर माँ इंतज़ार कर रही है।

(pic -google )


9 comments:

  1. मर्मस्पर्शी है दोनों रचनाएँ अपर्णा जी।
    एक अबोध बच्चे का जाना किसी माँ के लिए कितना दुखदाई होगा इसका अनुमान भर लगा सकते है बस हम। आपने बहुत मार्मिक लिखा।

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  2. सच कह रही हैं आप. एक बच्चे के जाने का दर्द वही समझ सकता है जिसने अपना बच्चा खोया है. हैरानी इस बात पर है कि कोई इंसान इतना नृशंश कैसे हो सकता है. कंहा जा रहा है हमारा समाज.
    प्रतिक्रया व्यक्त करने के लिए आपका सादर आभार

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  3. सत्य घटना पर आधारित आपकी दोनों रचनायेँ भावुकता का तूफ़ान लाती हैं। एक ओर दूसरी दुनिया में जाने वाले मासूम की मार्मिकता का आसमान छूती अभिव्यक्ति वहीँ दूसरी ओर एक व्याकुल माँ के मनोभाव। आँखें नम करती है आपकी प्रस्तुति।

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  4. आपका सादर धन्यवाद रवीन्द्र जी. ये ऐसी घटना है जो हर मन को द्रवित कर दे.समझ नही आता सुरक्षा के किस व्यूह को रचा जाय कि बच्चे, बच्चियां, औरतें , हर इंसान को सुरक्षा के कवच से सुसज्जित किया जा सके. आपका बहुत आभार

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  5. Bahut khubsurti se dard ukera hai. Tumhari peeda dekhkar samajh mein ata hai ki log in sab vibhats ghatnaon ki samanubhuti to karte hain par awashyakta ise hone se rokne ki hai.

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  6. हार्दिक आभार सुशील जी

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  7. एक बच्चे के जाने का दर्द वही समझ सकता है जिसने अपना बच्चा खोया है। बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति।

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  8. ज्योति दी, ब्लोग पर आने और अपने बहुमूल्य विचार व्यक्त करने के लिये धन्यवाद. इसी विशय पर आप का आलेख आज मैने आपके ब्लोग पर padha.बहुत मार्मिक लिखा है आपने. ब्लोग पर comment post करने मे कुछ समस्या आ रही थी इसलिये comment नही लिख पायी. सादर

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