Sunday, July 23, 2017

No Holiday in women's life

संडे हो या मंडे
नहीं है कोई हॉलिडे
काम किये जा घर के अंदर
नहीं है कोई छुट्टी जी।

कमर टूटती तो टूटने दो
पैर लरजते है लरजने दो
सर फटना तो आम बात है
क्योँ बनती हो डॉक्टर जी।

आज नहीं कुछ नया बनाया
वही पुराना आलू बैगन
होता है इतवार हमारा
क्यों करती हो खटपट जी।
झाड़ू पोछा ,चौका बर्तन
इसमें कौन सी मेहनत है ?
क्यों थकती हो बात बात में
घर में करती झिकझिक जी।

नया नया कुछ रोज़ बनाओ
कपड़े धो दो इस्त्री कर दो
बच्चों का इतवार निराला
उनको थोड़ी फुर्सत दे दो।

मेरे पास भी बैठो जरा
मेरा थोड़ा दिल बहलाओ
पानी बरसे बाहर  झम झम
बात बात में चाय बनाओ।

छुट्टी लेकर क्या कर लोगी
काम धाम तुम क्या करती हो ?
घर में रहती खाट तोड़ती
हर दम  सोती रहती हो.
सन्डे हो या मंडे
नहीं है कोई छुट्टी जी।
नहीं है कोई छुट्टी जी।  









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