Friday, June 30, 2017

रेशा - रेशा


रेशा - रेशा 

एक लावा बहता है उसके भीतर
जब भी चाहती है रक्त के बाहर निकाल फेंके उसे
वह रोटियों की परतों के नीचे छुप जाता है.
जब भी चीखना चाहती है जोर से
उसका गुस्सा हंसी बन फूट पड़ता है मुरझाये हुए होठों के बीच,
जब कोई कहता है तुम्हे बहुतअच्छी तरह जानता हूँ,
उसकी मूर्खता पर बस  मुस्कुरा के रह जाती है वह,
क्या इतना आसान है उसे समझना?
रेशा - रेशा उघड़ने के बाद भी सही सलामत दिख सकती है औरत,
सदियों तक हज़ार दरवाज़ों में बंद होने के बावजूद;
आज़ाद उडान बन सकती है औरत.


लाश का इंतजाम

 कहानी - लाश का इंतजाम

आख़िरी विकल्प लाश को कंधे पर उठाना ही था. प्यारी कल रात सरकारी अस्पताल के बाहर जमीन पर तड़प तड़प कर मर गई . कोई नहीं था जो अस्पताल के कर्मचारियों के ज़मीर को झिंझोड़ कर जगा सकता. कह सकता उनसे की बाहर जो औरत तड़प रही है उसका हक़ है कि उसे अस्पताल के भीतर एक बेड मिले. वो सुरक्षित जगह पर , सुरक्षित हाथों से और सुरक्षित माहौल में अपने बच्चे को जन्म दे . कौन कहां तड़प रहा है , कौन कंहा मर रहा है किसी से क्या मतलब? मरता है तो मरने दो , सरकारी बिल्डिंग के भीतर तो नहीं मरा है जो किसी की जवाबदेही होगी.
कल रात प्यारी को तेज दर्द उठा , लगा की समय हो गया है . दाई घर में नहीं थी , अब अस्पताल ले जाने के सिवा कोई और उपाय नहीं था. इतनी रात में जंगल से सात किलोमीटर दूर ,  बरसात का मौसम , रास्ते में नदी पार करना , साईकिल के अलावा कोई साधन नहीं ..... कैसे ले जाये प्यारी को अस्पताल .... बबुई समद सोच में डूबा था. लगता है अब प्यारी का भी आख़िरी  वक़्त आ गया. क्या ये भी छोटू और नन्हका के पास चली जायेगी. बबुई जैसे जम गया था. कौन मदद करेगा? लेकिन चुप बैठ भी तो नहीं सकता .
उसे दूर से लालटेन लेकर आता कोई दिखा. लगता है दाई आ गई. बबुई दौड़ा और दाई  के पैरों पर गिर पड़ा. दाई कुछ कर. इस बार बचा ले प्यारी को . तेरा ही आसरा है. “देखती हूँ , धीरज रख बाबू, कुछ नहीं होगा प्यारी को”. दाई जल्दी से झोपड़ी के अन्दर गई .
प्यारी जमीन पर चित पड़ी थी. खून बहे जा रहा था. दाई ने उसे हिलाया  प्यारी ! ओ प्यारी ! कब दर्द उठा है ... प्यारी होश में हो तब तो बोले.... दाई भीतर से ही चिल्लाई ... बबुई ! प्यारी बेहोश है , हालत गंभीर है , अस्पताल ले जाना पड़ेगा.
तब तक गाँव के कुछ लोग इकट्ठे हो गए  थे. दाई ने एक खटिया पर बिस्तर डाला औरबबुई  को बोली जा प्यारी को उठाकर ले आ , खटिया पर लाद कर अस्पताल ले जायेंगे. गाँव के कुछ आदमी तैयार हो गए जाने के लिए. रात ग्यारह बजे खटिया पर प्यारी को लाद कर चार आदमी चल दिए अस्पताल. पीछे सात -आठ आदिवासी घरों की वह बस्ती साथ हो ली ( कुछ बुजुर्ग और बच्चों को छोड़ कर) न जाने कब किसकी जरुरत पड़ जाये .
झमाझम बारिश में आगे आगे लालटेन लिए हुए दाई और पीछे पीछे दस बारह लोग पहाड़ से उतरकर नदी पार किये. गिरते पड़ते हांफते हुए किसी तरह अस्पताल पंहुचे . आसमान में सूरज लाल रंग बिखेरना शुरू कर चुका था. सुबह के चार बजे अस्पताल के बाहर वह आदिवासी टोली डॉक्टर को खोजती हुई...
अस्पताल में-
रात ड्यूटी वाली नर्स जम्हाई लेती हुई बाहर आयी, इतनी सुबह सुबह कौन आ गया. सारे बेड फुल हैं. कोई और अस्पताल ले जाओ. जगह नहीं है यंहा. बबुई  उसकी मिन्नतें करने लगा . मैडम जी एक बार देख लीजिये , मर जायेगी मेरे पत्नी. बड़ी मुश्किल से यंहा तक आये हैं . “ हम क्या करें?  डॉक्टर नहीं है अभी , आठ बजे तक आयेगी . उनका बच्चा बीमार है .अभी एडमिट नहीं कर सकते.  इतना कह कर नर्स अन्दर चली गयी. सब लोग सकते में . अब क्या करें. बड़े अस्पताल जा नहीं सकते . पैसा लगेगा.
प्यारी तड़प रही है खटिया पर . दाई चिल्लाई बाबू! चादर बिछाओ . प्यारी को जमीन पर लिटाओ और दौड़ती हुई फिर अस्पताल के भीतर गई . नर्स को खींचती हुई बाहर लाइ और चिल्लाने लगी .. मर जायेगी बेचारी , शरीर में खून नहीं बचा है  कुछ तो करो मैडम जी ! उन लोगों के चिल्लाने से पूरा अस्पताल हिल गया लेकिन नर्स ने प्यारी को छुआ तक नहीं. उन लोगों के सामने प्यारी उस दम तोड़ दिया. आसपास भीड़ लग गई. बबुई प्यारी का सिर अपनी गोद में रखकर वंही दहाड़ मार- मार कर रोने लगा.जो लोग रात में उसे जिंदा ले कर आये थे वे सन्न थे . सब चुप . सबकी आँखों में सन्नाटा पसर गया था.
मर गयी प्यारी और मर गयी उनकी उम्मीद. लाश अस्पताल के बाहर पडी है  . अब लाश को घर ले जाना है . “लाश को जल्दी हटाओ , नहीं तो मेरी नौकरी चली जायेगी “ . नर्स चिल्लाने लगी.
“मैडम जी गाडी का इंतजाम कर दीजिये , लाश को घर तक ले जाना है , दाई गिदगिड़ाई “.  गाडी नहीं मिल सकती . मरीज अस्पाल में भरती नहीं थी . गाडी सिर्फ भारती मरीजों को मिलती है . इतना कह कर नर्स अस्पताल के अन्दर चली गयी.
बबुई उठा , उसने प्यारी की लाश को अपने कंधे पर लाद लिया और चल दिया अपने घर की ओर...पीछे पीछे वह टोली जो रात में उम्मीद लेकर आयी थी कि डॉक्टर बचा लेंगे उस गाँव की सबसे मिलनसार औरत को .... अब लाश के पीछे चल रहे थे.
 पत्नी का शव कंधे पर लादे हुए बबुई बुदबुदाता जा रहा है “दाई झूठ कहती है . ये लोग हमारी मदद क्योँ करेंगे , ये हमसे बात नहीं करना चाहते , हमें छूना नहीं चाहते . हम जंगली इनके लिए कोई मायने नहीं रखते. एक बार देख लेती नर्स तो शायद बच जाती प्यारी . गाँव में गाडी नहीं थी तो हम ले आये इसे खटिया पर लाद कर. यहाँ गाड़ी खड़ी है लेकिन हमें नहीं मिल सकती. कोई बात नहीं.  हम कर लेंगे लाश का इंतजाम.
प्यारी! अब कौन लीपेगा घर . कौन दिखायेगा दीवारों पर हांथों की कलाकारी . कौन लायेगा महुआ के फूल . कौन इमली , कनेर को पानी देगा . कौन गायेगा नदी पर सिर्फ मेरे लिए गीत. डरना मत वंहा . मै जल्दी ही आउंगा तुम्हारे पास. फिर हम मिलकर बंशी बजायेंगे नदी के किनारे. मेरे लिए इंतजाम कर के रखना .


Thursday, June 29, 2017

सच खांटी सच

सच खांटी सच

मौन है मीठा , मुखर तीखा
मगर बेचैन है जीभ
क्या करू ! कुछ तीखा कहने का मन है ,
कह दू कुछ - जो है तीखा पर खांटी सच
आग लगे ऐसा कटु
क्या कहू ? कह दूँ या न कहू.....................
इसलिए "अनुराग आग्नेय " कहते हैं
मेरे मुह पर मत बोलो की स्लिप लगा दो
वरना मै बोल पडूंगा
परतें डर परतें खोल पडूँगा
बेनकाब कर दूंगा
नंगा नाच नचा दूंगा
सारी औकात बता दूंगा 
बांबी में हाथ अगर डाला तो ऐसा डंक लगेगा 
दंश न उसका भूल सकोगे जीवन भर 
सच यह है की कल रात एक धर्म के ठेकेदार ने धर्मस्थल पर :
तीन साल की बच्ची के साथ अपनी हवस मिटाई
एक माँ ने चार दाने चावल के लिए अपने दूधमुहे लाल को बेच दिया
और सच....................... मत सुनो .................. क्या करोगे !
तुम भी तो ओह! कहकर पृष्ठ पलट दोगे.....

यादें

यादें 

न जाने जोड़ना अच्छा है या घटना
यादों में सिर्फ जोड़ा जा सकता है घटाया नहीं
लेकिन यादों का स्वाद क्या बदला जा सकता है ? नहीं न !!!!!!!!!
चाहती हूँ यादों  को जोड़ती जाऊँ
कुछ लोरियाँ , मीठी रोटियां , बातों की चाशनी
ऐसे मर्तबानो में भर दूँ की
जब भी खोलूँ  एकदम ताजा रहे;
तुम भी दो न मेरे हाँथ में
एक मीठी झप्पी ,  एक भीना स्पर्श
कुछ ताजे फूल जैसे डेल थे मेरे गले में कभी 
आओ न ,  हमारा साथ एक जिल्द में नत्थी कर दूँ
उस  मे कुछ सलमे सितारे सजा दूँ
की जब जब खोले हम साथ साथ मिलें
बरसो बाद , सदियों बाद
तुम्हे पता है ! तुम्हारी चुप्पी का स्वाद कैसा है???
कसैला , कड़वा , अनचाहा
फिर भी , ज्यादा  मीठे के साथ थोड़ा कड़वा भाता है
लेकिन ज्यादा ; हजम नहीं होता !!!!!



उम्मीद


 उम्मीद 

क तिनका धूप के बावजूद

बची है रोशनी की थोड़ी सी उम्मीद

कि बंजर घोषित धरती पर भी

उग आता है कभी कभी

बबूल सा कोई पौधा

और आने जाने वाले पथिकों के लिये

बन जाता है थोड़ी देर सुस्ता लेने का छोटा सा आसरा