Friday, October 20, 2017

मंहगाई में त्यौहार



चीनी मंहगी, गुड़ भी मंहगी
मंहगा दूध मिठाई है,
खील बताशे मंहगे हो गए
क्योँ दीवाली आयी है?

एक नहीं, दो नहीं, दस नहीं
खुशियों से है भरा बाज़ार,
कुछ लोगों की जेबें भरता
जाल बिछा है अपरम्पार.

खाली चूल्हा, जेबें खाली
अपने हिस्से आया शून्य,
सब चीजों का दाम बढ़ गया
मानव का बस घट गया मूल्य.

रेल टिकट का दाम बढ़ गया
भैया कैसे आऊँ मै?
रोली अक्षत मंहगे हो गए
कैसे प्यार लुटाऊँ मै?

लिखती हूँ कुछ शब्द नेह के
यही हमारा हैं त्यौहार,
कुछ पढ़ना कुछ जी लेना तुम
इन्हें समझ लेना उपहार.

(Image credit google)



Friday, October 13, 2017

मांग का मौसम


प्रेम की मूसलाधार बारिश से
हर बार बचा ले जाती है खुद को,
वो तन्हा है.......
है प्रेम की पीड़ा से सराबोर,
नहीं बचा है एक भी अंग इस दर्द से आज़ाद.
जब-जब बहारों का मौसम आता है,
वो ज़र्द पत्ते तलाशती है खुद के भीतर,
हरियाले सावन में अपना पीला चेहरा...
छुपा ले जाती है बादलों की ओट,
कहीं बरस न पड़े.....
उसके अंतस का भादौं;
पलकों की कोर से.
जिया था उसने भी कभी.....
हर मौसम भरपूर.
मांग में;
पतझड़ का बसेरा हुआ जब से,
सूख गयी है वो....
जेठ के दोपहर सी;
कि अब, बस एक ही मौसम बचा है
उसके आस-पास
वैधव्य का......

Sunday, October 8, 2017

खान मजदूरों का शोकगीत

भारत में झरिया को कोयले की सबसे बड़ी खान के रूप में जाना जाता है जो की ईंधन का एक बड़ा श्रोत है। ये देश में ऊर्जा के क्षेत्र से  होने वाले आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परन्तु वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार इस खान में लगभग ७० से अधिक् स्थानों पर आग लगी है जो १०० वर्गमील से भी अधिक क्षेत्र को कवर करती है। ये आग कभी - कभी धरती का सीना फाड़ कर बाहर निकल आती है और मासूम ज़िंदगियाँ मिनटों में मौत के हवाले हो जाती हैं। सरकार , प्रशाशन और उस क्षेत्र  में काम करने वाली  कंपनियां उस पूरे क्षेत्र में रहने वाले लोगों को वंहा से विस्थापित कर उनके पुनर्वास  की योजनाओं पर काम कर रही है।  कुछ लोग जा चुके हैं कुछ नहीं जाना चाहते।
खान मजदूर आग के बीच काम करते है , जलते हैं , मरते हैं। सुरक्षा साधनों के बावजूद वे हर क्षण मौत से दो -दो हाँथ करते है।
खान मजदूरों के साथ बातचीत के बाद लिखी गयी एक कविता .........

कोयला खदानों में काम करते मजदूर, 
गाते हैं शोकगीत,
कि टपक पड़ती है उनके माथे से 
प्रतिकूल परिस्थितियों की पीड़ा,
उनके फेफड़ों में भरी कार्बन डाई आक्साइड
सड़ा देती है उनका स्वास्थ।
धरती के ऊपर भी, नीम अंधेरा 
तारी रहता है उनके मष्तिष्क पर.
अँधेरे के बादल बरसते है,
सुख का सूरज उन्हें दिखाई नहीं देता। 
जब -जब लेते हैं हम खुली हवा में सांस 
उनके शरीर का एक एक अंग;
तरस खाता है हमारी आत्म केंद्रीयता पर.
धरती की परतों में जमा कोयला 
उघाड़ देता है हमारा दोहरा चरित्र।
जब -जब दहक कर फट जाता है धरती का सीना 
जमींदोज़ हो जाती हैं ज़िंदगियाँ।
हमें क्या !
हम व्यस्त हैं चाँद के तसव्वुर में,
खोये हैं प्रिय के आलिंगन में,
अपने सपनों को सजा रहे है 
रंगों, फूलों और तितलियों से,
बच्चे, बूढ़े,जवान आग की हवस का 
शिकार हो रहे हैं. 
कोयला खानों की आग 
लीलती जा रही है गरीबों की दुनिया।
सुना है पुनर्वास की योजना पर काम चल रहा है.......... 
क्या अपनी जड़ों से उखड़ने के बाद
बस पाया है कोई दुबारा किसी और जगह? 
 (चित्र साभार गूगल )





Wednesday, October 4, 2017

"ग्राहक" लघुकथा

रांची से जमशेदपुर आने में यही कोई दो- ढाई घंटे लगते थे हमेशा। सोचा था १०- ११ बजे रात तक घर पंहुच जाऊंगा। उस दिन जैसे ही चांडिल पार किया ट्रकों की लम्बी लाइन लगी थी रोड पर। लोगों से पूछा तो पता चला आगे २ किलोमीटर तक ऐसे ही जाम है। किसी भी सूरत में आगे जाना नामुमकिन है। मन में बड़ी कोफ़्त हो रही थी। घर पंहुच कर भी नहीं पंहुचा था। घर पर फोन कर के सूचना दी कि चांडिल में फंसा हूँ। जाम कम होते ही निकलने की कोशिश करूंगा। घर पर खाने के लिए मेरा इन्तजार न करें। 
बहुत भूख लग रही थी। गाड़ी में बैठे- बैठे ही इधर - उधर नज़र दौड़ाई कंही कोई रेस्टोरेंट या कोई ढाबा ही नज़र आये. जंहा कुछ खाने के लिए मिल जाता। दूर एक ढाबा सा दिखाई दिया। अब गाड़ी छोड़कर कैसे जाऊं। सोचा कोई दिख जाता तो उसी से कुछ मांगा लेता। गाड़ी से बाहर निकल इधर - उधर देख रहा था। तभी ६-७ साल का एक लड़का मेरे पास आया. पतला - दुबला, थोड़ा सांवला सा। कान तक बढे हुए बाल। आंखों में अजीब सी निरीहता। मेरे पास आकर बोला, "साहब आपके पास पैसे  हैं"? मैंने कहा हाँ , क्योँ? उसके चहरे पर खुशी तैर गयी. "साहब मुझे बहुत भूख लगी है. वो ढाबा वाला  मुझे खाने के लिए कुछ नहीं दे रहा. माँ के पास सारे पैसे ख़त्म हो गए हैं. मेरी मां ने दो दिन से खाना नहीं बनाया। बोलती है जाओ होटल पर कुछ काम करो, बदले में वो खाना खिला देगा।

कल ढाबा वाले ने मुझे खाना दिया भी था लेकिन आज दोपहर में मैंने चुपके से एक पकौड़ी खा ली थी, तो उसने मुझे बहुत मारा और अब खाना भी नहीं दे रहा, जबकि मै सुबह से होटल में काम कर रहा हूँ".वो सब कुछ एक सांस में बोल गया. फिर थोड़ा रूककर मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और मेरा हाँथ पकड़ कर बोला," साहब ग्राहक बनोगे। माँ कहती है ग्राहक आएगा, हमें पैसा देगा तभी घर में खाना बनेगा". साहब मेरी माँ के ग्राहक बन जाओ न! फिर हम दोनों को खाना मिल जाएगा। ग्राहक आता है , माँ  के साथ झोपड़ी में जाता है , फिर मां को पैसा देता है।  माँ उन पैसों से सामान लाती है , खाना बनाती है और हम दोनों एक साथ बैठकर खाते हैं। साहब , ग्राहक बन जाओ न. वो मेरा हाँथ पकड़ कर जैसे जिद करने लगा. उसकी बातें सुनकर मुझे लकवा मार गया था. इतना छोटा बच्चा अपनी माँ के लिए ग्राहक खोज रहा था................

मैंने अपना पर्स निकाला, हाँथ में जो भी रुपये आये उस बच्चे के हाँथ पर रख दिए और बोला जाओ माँ को दे देना. कहना ग्राहक आया था. आज घर के बाहर से ही चला गया। मैं भागकर अपनी गाड़ी के अंदर बैठ गया. पेट की भूख न जाने कहां गायब हो गयी थी।  
(Image credit google)

Tuesday, October 3, 2017

अगले साल फिर दो अक्टूबर आने वाला है!


आज मोचीराम ने जूतों पर पोलिश नहीं की,
चेहरे  पर पोलिश लगाए घूम रहे हैं,
हंस रहे हैं....
हे हे हे हो हो हो .....
जूतों को क्या चमकाना!
जब चेहरों की चमक गायब है,
फटे जूतों को सिलकर क्या होगा:
उतने में नए खरीद लो
चाइना माल है न;
एक का दस, एक का दस .......
हम!
अरे हम तो कामगार हैं,
मशीनों के आगे बेकार हैं,
हुनर गया तेल लेने .......
जाओ दस में पांच जोड़ी लाओ,
पूरे घर को पहनाओ ,
हमारे बच्चों का एक फाका और सही!
तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था में...
अर्थ उनका है,
व्यवस्था हमारी,
माल उनका,
बाज़ार हमारा...
वे अपना कचड़ा यंहा जमा कर रहे हैं,
हम उस कचड़े पर ऐश कर रहे हैं....
हमारे आदमी ले जाओ,
पैसा दे जाओ,
आदमी का क्या मोल?
यंहा हर आदमी टका सेर बिकता है,
वाचाल राजा आँखों पर पट्टी बाँध सोता है,
हुनरमंद हाँथ ट्रेनों में लटका है,
मीडिया की चकाचौंध में असली मुद्दा सटका है,
गांधी का रामराज चरखे का चक्कर लगाता है,
खीझता है ,थकता है, बेहाल हो बैठ जाता है,
सत्य और अहिंसा किताबों में बंद है,
गांधी अब संग्रहालय की शान है,
महापुरुषों की पुण्यतिथियों पर श्रद्धांजलि का बोलबाला है,
अगले साल फिर दो अक्टूबर आने वाला है..............

(image credit google) 













Saturday, September 30, 2017

मै खड़ा हूँ

चाहता हूँ तुम्हे लिपिबद्ध कर लूं
न जाने कब छिटक कर दूर हो जाओ
किसी भूले-भटके विचार की मानिन्द,
मै खोजता ही रहूँ तुम्हे
चेतना की असीमित परतों में....
तुम्हारी लंबित मुलाकातों में
तुमसे ज्यादा;
तुम्हारी अल्लहड़ हंसी होती है,
वो बेसाख्ता मुस्कुराती हुयी पलकें
जैसे थाम लेती हैं मन की उड़ान.
तुम्हारी उँगलियों में कसमसाती है धूप;
और तुम बाहें फैलाए उड़ा देती हो उसे 
इन्द्रधनुषीय रंगों में,
चाहता हूँ सहेज लूं तुम्हारी वो आग
जो बोलते ही राख में भी जान डाल देती है,
कौंधती है बिजली की तरह,
मेघ बन बरस जाती है बंजर धरती पर.
तुम्हारा होना आज भी है
फुलके की वाष्प सा नर्म-गर्म ......
कि दौड़ जाता हूँ बार-बार उसी मोड़ पर;जंहा
तुमने कहा था....
रुको, अभी आती हूँ और छिटक गयी थी हाँथ से दूर.
जब भी लौटोगी पाओगी वंही,
मील के पत्थर सा अब भी गड़ा हूँ
तुम्हारी लंबित मुलाक़ात के लिए
अब भी खड़ा हूँ. 

 
 

  

Wednesday, September 27, 2017

ओ बेआवाज़ लड़कियों !












बेआवाज़ लड़कियों !
उठों न, देखो तुम्हारे रुदन में........
कितनी किलकारियां खामोश हैं.
कितनी परियां गुमनाम हैं
तुम्हारे वज़ूद में.
तुम्हारी साँसे
लाशों को भी
ज़िंदगी बख़्श देती हैं....

ओ बेआवाज़ लड़कियों!
एक बार कहो
जो तुमने अब तक नहीं कहा........
कहो जो बंद पड़ा है
तुम्हारे तहखाने में.......
कहो कि दुनिया
बेनूर हो रही है
तुम्हारे शब्दों के बगैर। ......
इस मरघट सन्नाटे में
अपनी आवाज़ का संगीत छेड़ो।
अपने शब्दों का चुम्बन जड़ दो
हर अवसादग्रस्त मस्तक पर.
उल्लास का वरक लगा दो
हर ख़त्म होती उम्मीद पर.

ओ  बेआवाज़ लड़कियों !
बोलो, कहो अनकही कहानियां
इससे पहले कि
ये समाज तुम्हारे ताबूत पर
अंतिम कील ठोंक दे।

(pic - google )

Thursday, September 21, 2017

कौन है 'वो'


  

1. 

आज उसने अपना दर्द 
रोटी पर लगाया 
और चटकारे ले-ले कर खाया,
गुस्से को चबा-चबा कर हज़म कर गयी,
भूख इतनी थी कि निगल गयी अपना अस्तित्व चुपचाप,
अब बंद पड़ी है बोतल के अन्दर;
जब कोई ढक्कन खोलेगा;
समझ जाएगा उसके होने के मायने।

२.
चौखट पर बिखरी है धूप बन.... 
घर को रौशन करने को आतुर,
ओस बन छुआ है तुम्हारे तलवों को 
दूब की हरियाली बन...... 
जड़ जमाई है तुम्हारे मन में,
बूँद बन छुपी है..... 
तुम्हारी पलकों के नीचे;
अरे- अरे हौले से छूना!
कंही दरक न जाये उसका स्वाभिमान;
मर्यादा है तुम्हारे घर की,
सदियों से यही तो कहते आये हो न! 

3.
सात पर्दों में,
दरवाजों के अन्दर 
चुन्नियों और नकाबों में,
कंहा -कंहा छुपाया है;
फिर भी निकल आती है,
खुशबू बन बिखर जाती है.
नीम के बीज सी,
कभी कड़वी कभी मीठी;
आवाज़ है वो!
लोरी बन सुला सकती है
तो बहरा भी कर सकती है
बस पंगा मत लेना! 




(Picture credit google)

Wednesday, September 20, 2017

कहानी- दाग ही तो है

ये कहानी पहले रचनाकार पर प्रकाशित हो चुकी है. नीचे इसका लिन्क दिया गया है. मेरे ब्लोग पर भी इसे  पढ़ सकते हैं.
http://www.rachanakar.org/2017/06/blog-post_19.html?m=1
http://www.rachanakar.org/2017/06/blog-post_19.html?m=1



कहानी-
बहुत दिनों बाद आज जीन्स पहन कर घर से निकली थी। जीन्स में जो कम्फर्ट मिलता था वो किसी और ड्रेस में नहीं था। मन थोड़ा खुश था, उन्मुक्त , एक अलग एहसास। सोचा थोड़ी दूर पैदल चल कर अगले बस स्टाप से बस पर पकड़ूंगी। समय भी था । आज ऑफिस में ज्यादा काम भी नहीं था। बस स्टॉप पर पारूल मिल गयी मेरी कलीग। हम दोनों साथ साथ बस में चढ़े। बस में ज्यादा भीड़ नहीं थी। सामने की सीट खाली थी । हम दोनों बैठ गये। मैं बैठी ही थी कि पेट के नीचे थोड़ा मरोड़ सा हुआ। थोड़ी देर बाद मुझे कुछ डिस्चार्ज सा महसूस हुआ । मैं समझ गयी थी क्या हुआ लेकिन चार दिन पहले..... अब क्या करें। ब्लड शायद जीन्स की हद पार कर चुका था। मैं पेट को दबाकर बैठी थी इस उधेड़बुन में क्या करूं कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मैंने पारूल के कान में बताया तो उसका चेहरा देखने लायक था । वो क्या बताती उसकी तो जैसे जान अटक गयी थी। मेरा स्टॉप आने वाला था लेकिन सीट से उठूं कैसे ... सीट में दाग लगा हुआ तो... किसी ने देख लिया तो.... ऑफिस तक कैसे जाऊंगी... बैग में एक सैनिटरी पैड है लेकिन टॉयलेट तो कहीं नहीं है ।
बस स्टॉप आ गया था । मैंने पारूल से कहा पहले तू उतर फिर मैं खड़ी होऊंगी और हम दोनों जल्दी से बस से उतर जायेंगे। लेकिन हम खड़े ही होने वाले थे कि बस का कंडक्टर हमारी सीट के पास आ गया । कंडक्टर को देख कर ऐसा लगा मानों कोई भूत मेरे सामने आकर खड़ा हो गया हो। वो बोला ' मैडम आप का स्टॉपेज आ गया आप खड़ी हो जाइये ' और वो एक अन्य महिला को बुलाने लगा जो बहुत देर से खड़ी. थी।
कंडक्टर मेरी सीट के पास ही था मैं जैसे ही खड़ी हुयी उसकी नजर सीट पर चली गयी । सीट पर दाग लग चुका था पारूल जब तक मेरे पीछे खड़ी होती उसने मेरी जीन्स पर भी दाग देख लिया था। वो मुझे घूर रहा था। मेरी नज़र ऊपर नहीं उठ रही थी। लग रहा था जैसे ये पल आने के पहले मैं मर क्यूं नहीं गयी। वो मुझ पर चिल्ला रहा था । ऐ मैडम अपने आप को संभाल नहीं सकती तो घर के बाहर क्यों निकलती हो । अब ये सीट कौन धोयेगा तेरा बाप। इसीलिये लड़कियों को घर में बन्द कर के रखना चाहिये। बस में जैसे तूफान आ गया था। क्या हुआ क्या हुआ हर कोई जैसे सीट और मेरे कपड़े पर लगे दाग को देख लेना चाह रहा हो। इतनी शर्मिंदगी .....  ओह.... आज मैं घर से नकली ही क्यूं। ड्राइवर ने बस रोक दी थी। पारूल ने तब तक अपना स्कार्फ मेरी कमर पर बांध दिया था और बिना कुछ बोले मेरा हाथ पकड़कर जल्दी से बस से नीचे उतर गयी। बस आगे बढ़ गयी थी। लेकिन समस्या अब ऑफिस तक पहुंचने की थी। पारूल बोली तुम किसी तरह ऑफिस पहुंच कर टॉयलेट में घुस जाना और मैं तुम्हारे लिये नये कपड़े ले आती हूं आखिर दिन भर काम भी तो करना है। मैं जैसे भागते हुए ऑफिस पहुंची और भागकर टॉयलेट में घुस गयी । पहली बार टॉयलेट मां की गोद जैसा लगा जिसने पूरी दुनिया की नजरों से मुझे छुपा लिया था।
मैं उन दीवारों के भीतर रो रही थी अपने औरत होने पर । कहते हैं ये औरत की सबसे बड़ी ताकत हैं फिर थोड़ा सा दाग लग जाने पर इतनी बेइज्जती.....
क्या औरत होना गुनाह है या दाग लग जाना.... लेकिन पापा ने तो ऐसा कभी नहीं कहा था। हां  पापा ने ही मुझे जीवन का हर पाठ पढ़ाया था क्योंकि मेरी मां तभी भगवान को प्यारी हो गयी थीं जब मैं मात्र दो साल की थी। मुझे मेरे पापा ने अकेले पाला । दादी, बुआ , नानी किसी की भी सहायता के बिना। उनका कहना था अगर अकेली औरत बच्चे को पाल सकती है तो अकेला मर्द क्यों नहीं। उन्होंने मुझे खिलाना, पिलाना, नहलाना , धुलाना ,पढ़ना लिखना सब कुछ सिखाया। मेरे घर में सिर्फ हम दोनों ही रहते थे। मुझे पापा से कोई डर या झिझक नहीं थी । मैं उनके साथ सब कुछ शेयर करती थी। कभी ऐसा नहीं लगा कि ये बात पापा को बताऊं या नहीं । या उनसे कुछ छुपाना भी चाहिये।
मुझे याद है एक बार मैं घर के बाहर मैदान में क्रिकेट खेल रही थी अपने मोहल्ले के बच्चों के साथ । अंशुल ने आकर कहा देख निक्की तेरी स्कर्ट पर खून लगा है शायद तेरे पैर में चोट लग लग गयी है। मैं डरकर घर भागी थी कि पापा को पता चला कि मुझे चोट लग गयी है तो बहुत डाट पड़ेगी। मैं डर कर अपने कमरे में बन्द होकर बैठ गयी थी । चोट तो कहीं नहीं लगी थी लेकिन पेशाब की जगह से खून बह रहा था। मुझे लगा शायद अन्दर कहीं चोट लग गयी है। उस समय समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं । मैं कमरे में लगभग एक घंटे तक ऐसे ही बैठी रही। बाहर पापा के आने की आहट हुई । अब और डर लगा कि पापा पूछेंगे तो क्या बताऊंगी। पापा मुझे बाहर से आवाज दे रहे थे और मैं सुन कर भी कमरे से बाहर नहीं निकल रही थी। आखिर दरवाजा खोलना ही पड़ा। पापा जैसे ही अन्दर आये मैं उनसे चिपक कर जोर जोर से रोने लगी। वे बेहद डर गये थे आखिर मुझे क्या हो गया है। मुझे चुप कराने के बाद उन्होंने पूछा क्या हुआ है , चोट कैसे लगी , कहा लगी...... सवाल पर सवाल। मैं चुप थी । मैंने कहा पापा चोट नहीं लगी लेकिन बार बार खून बह रहा है ।
पापा शायद समझ गये थे। उन्होंने मुझे समझाया कि डरने की कोई बात नहीं है। ऐसा सब लड़कियों को होता है। उन्होंने मुझे घर से ही साफ कपड़ा लाकर पैन्टी में लगाकर दिया और बताया कि उसे कैसे पहनना है । फिर दुकान से लाकर मुझे सैनिटरी पैड दिया और कैसे इस्तेमाल करना है ये भी बताया । उस दिन उन्होंने मेरे लिये मेरी पसन्द का खाना बनाया और बड़े प्यार से मुझे खिलाया । शायद मुझे अच्छा एहसास करवाने के लिये। या मेरे शरीर में हो रहे परिवर्तनों का सामना करने के लिये और मुझे शारीरिक तथा मानसिक तौर पर तैयार करने के लिये। 
मेरे लिये ये नया अनुभव था और मेरे पापा के लिये भी। वे आज पूरी तरह से मेरी मां बन गये थे। उन्होंने मुझे समझाया कि ये दाग लग जाना साधारण बात है । उससे डरना नहीं चाहिये और ये गन्दा बिलकुल नहीं है। उन्होंने कभी नहीं बताया कि समाज के लिये औरत के शरीर में होने वाली ये छोटी सी अनिवार्य घटना इतनी बड़ी दुर्घटना होती है।
मैं जैसे जैसे बड़ी हो रही थी , समाज में घुल मिल रही थी वैसे वैसे मुझे भी ये दाग गन्दे लगने लगे थे। माहवारी होने पर चेहरे की उड़ी हुई रंगत देखकर पुरुष सहकर्मियों का फुसफुसाना कि लगता है मैडम अपने खास दिनों में हैं या आप आज छुट्टी क्यों नहीं ले लेती तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही जैसी सलाह मिलने पर खुद को भी तबियत खराब लगने लगती थी। अपनी सहेलियों की बातों , उनकी मम्मियों द्वारा दी गयी अपने स्त्रीत्व को सात परदों के भीतर छुपाने की सीख के असर के कारण ही आज मैं ऑफिस के टॉयलेट की दीवारों के बीच रो रही थी और पारूल का इन्तजार रही थी। 
लेकिन बस में जो हुआ था और मेरे भीतर जो डर , शर्मिंदगी थी वो मेरे पापा की सीख तो बिलकुल नहीं थी नहीं तो मैं कंडक्टर से कह न देती दाग ही तो है साफ हो जायेगा। बस में इतने लोग उल्टियां करते है वो कैसे साफ हो जाती है और भाग कर नहीं आराम से सबसे नजरें मिलाते हुए बस से उतर कर आती।

Monday, September 18, 2017

आवाज़ कौन उठाएगा?


मेरे शब्दों  का रंग लाल है 
रक्तिम लाल!
जैसे झूठी मुठभेड़ में मरे 
 निर्दोष आदमी का रक्त....
जैसे रेड लाइट एरिया में पनाह ली हुई....... 
औरत के सिन्दूर का रंग.
 जैसे टी बी के मरीज का खून .....
जो उलट देता है अपनी गरीबी....
हर खांसी के साथ.
ये रक्तिम शब्द भी इतने बेज़ान हैं......
बस पड़े रहते हैं .........
काल-कोठारी के भीतर!
आवाज़ कौन उठाएगा??????????????????????????
(image credit google)

Sunday, September 17, 2017

दूसरी औरत से प्रेम



वो जो चली गयी है अभी अभी तुम्हे छोड़कर,
है बड़ी हसीन !
जैसे नए बुनकर की उम्मीद,
उँगलियों से बुने महीन सूत के जोड़ सी। 
जब भी तुम चूमना चाहते हो मुझे,
उसके होंठ..... 
मुझे तुम्हारे होठों पर नज़र आते हैं;
और उसके गालों का गुलाबीपन .....
छा जाता है मेरे वजूद पर.
उसके इत्र की खुशबू .......
कमबख्त जाती ही नहीं इस कमरे से .
जब भी थामना चाहती हूँ तुम्हारा हाँथ........
उसकी नाज़ुक उंगलियाँ 
मेरे तन में सरगम छेड़ देती हैं.
वो हार तो गयी है मुझसे ....
हमारे जायज़ रिश्ते को बचाने के लिए;
पर मै उसके प्रेम में गुम सी गयी हूँ.

(picture credit- google)

Friday, September 15, 2017

तुम्हारा उपहार



आज तुम्हारी रजिस्ट्री मिली है मुझे,
कुछ प्यार के आभूषण हैं
कुछ सपनों की पोशाकें,
वही जो तुमने अपनी दहलीज़ के नीचे दबा रखी थीं.
मैंने तुम्हारे उपहार पहन लिए है,
देखो न कैसी लग रही हूँ?
वैसी ही न!
जैसी एक शाम......
कॉफ़ी की अंतिम बूँद में छोड़ आये थे मुझे.....
या जैसी दबा आये थे......
पार्क में सूखे पत्तों के नीचे,
मै तो अब भी वैसी ही हूँ;
जैसी तुमने कैद कर रखा है.....
अपने मखमली संदूक में
और थोड़ा सा अपने तकिये के नीचे.....
अपने चेहरे पर....
तुम अब भी मुझे पढ़ते हो हर रोज़......
मेरा कुछ हिस्सा तुम अपनी जेबों में भी रखते हो;
और कुछ अपने दोस्तों के कानों में.
तुम्हारे बैंक बैलेंस में.......
बढ़ते हुए शून्यों की जगह मै ही तो हूँ;
फिर भी!
यंहा-वंहा रखकर क्यों भूल जाते हो मुझे?
इन उपहारों के साथ मुझे भी क्यों न भेज दिया मेरे पास?  
शायद मैं ‘मै’ हो पाती और तुम ‘तुम’.

                                           (चित्र साभार google)                                      

Wednesday, September 13, 2017

स्कूल में बच्चे की ह्त्या - २ कवितायें


1.
ये जो तुमने मौत ओढ़ाई है मुझे
कितनी लाचार है अपनी कोशिशों में.
मै तो अब भी ज़िंदा हूँ तुम्हारे खून से सने हाथों में ,
तुम्हारे दुधमुहे बच्चे की बोतल में मेरी साँसे बंद हैं
और तुम्हारी पत्नी की मुस्कान :
ज़रा गौर से देखो! मेरी खिलखिलाहट नज़र नहीं आ रही.
स्कूल के बाथरूम में जब रेत रहे थे मेरी गर्दन;
तुम्हारी आत्मा तो तभी मर गयी थी
और मेरी चीखें
तुम्हारी नींद पर लगा दाग हैं.
बंद करो आँखे!
मेरी तड़पती देह तुम्हे सोने नहीं देगी
समझ नहीं आता तुमने क्यों किया ऐसा?
अपने बच्चों की मुस्काने खरीदने के लिए;
वो तो तुम अब भी नहीं देख पाओगे.
जब जब हँसेंगे तम्हारे बच्चे
मेरा खून से लथपथ ज़िस्म
तुम्हारी नज़र का पर्दा बन जाएगा.  

२.
चाँद तारे चुप है
तितलियों के रंग जाने कंहा खो गये
आज गुब्बारों की उड़ान मर गयी है
तुम्हारी फेवरेट चाकलेट कब से पड़ी है बिस्तर के नीचे
तुम्हारी रिमोट कार  कब से बेचैन है तुम्हारे लम्स के लिए......
ये इतना सन्नाटा क्योँ है?
सारे खिलौने गुमसुम से हैं
और बगीचे में खिले फूलों से खुशबू नदारद.......
तुमको आ जाना चाहिए था अब तक मेरे लाल!
देखो न हज़ार बार दरवाजे के बाहर झांक चुकी हूँ
आने दो ड्राइवर को
आज उसकी खबर लेती हूँ,
कोई इतनी देर करता है भला
बच्चे को घर पंहुचाने में.
मेरे बच्चे ज़ल्दी लौटना घर सही सलामत
जैसे गए थे..............
हर माँ इंतज़ार कर रही है।

(pic -google )


Tuesday, September 12, 2017

माँ का होना-न होना









तुम्हारा जाना बहुत अखर रहा है माँ!
अनुपस्थिति है फिर भी है उपस्थिति का एहसास. 
होने न होने के बीच डोलते मनोभाव!
कैसे कहूँ! तुम थीं तो सोचता था कब आयेगा तुम्हारा वक्त,
बिस्तर साफ़ करना,धोना, पोछना, नहलाना, खिलाना, पिलाना 
उकता गया था मै तुम्हारे इन कामों से,
तंग आ गया था तुम्हारे बार-बार आवाज़ देने से,
तुम्हारी कराह से नींद टूटती थी मेरी
कोसता था; तुमको, खुद को और इन परिस्थितियों को.
आज तुम नहीं हो फिर भी है तुम्हारा एहसास,
तुम्हारा होना इस कमरे में तैर रहा है,
फ़ैली है गन्ध चारों ओर,
महसूसता हूँ तुम्हे अपने भीतरी-अपने बाहर.
अब कोसता हूँ खुद को कि;
क्योँ नहीं तुम्हारे होने का जश्न मना पाया माँ !
जैसे तुमने मनाया था जश्न मेरे होने का
अपने भीतर- अपने बाहर.

(picture credit Google)

Sunday, September 10, 2017

हम प्रेम पगी बाते छेड़ें

pic credit google 















कुछ हल्की- फुल्की बातें हों 
कुछ नेह भरी बरसातें हों 
कुछ बीते जीते लम्हे हों 
कुछ गहरी- उथली बातें हों.

कभी हम रूठा -रूठी खेलें 
कभी हम थोड़ीे मनुहार करें 
कभी आपा -धापी भूल  चलें 
कभी एक -दूजे का हाँथ गहें।

कभी एक कदम मै और बढ़ूँ  
कभी तुम थोड़ा अभिमान तजो 
कभी एक -दूजे के मानस में 
हम प्रेम भरी बौछार करें। 

तुम जीते हो मन में मेरे 
मै स्पंदन तेरे तन का 
तुम  मेरे भावों की धरती 
मै जीवन भर आकाश तेरा।

आ जी लें अपने सपनों को 
हम एक दूजे के कन्धों पर 
तुम मेरी सीढ़ी बनो कभी 
मै तेरी क्षमता बन  जाऊं। 

जब रात कोई काली आये 
हम हाथ थाम आगे आएं 
सब स्याह -कठिन घड़ियों में फिर 
हम प्रेम पगी बाते छेड़ें। 



Friday, September 8, 2017

हम सफेदपोश!



आओ न थोड़ी सादगी ओढ़ लें
थोड़ी सी ओढ़ लें मासूमियत
काले काले चेहरों पर थोड़ी पॉलिश पोत लें
नियत के काले दागों हो सर्फ़ से धो लें.

उतार दें उस मज़दूर का कर्ज
जो कल से हमारे उजाले के लिए आसमान में टंगा है
भूखा प्यासा होकर भी काम पर लगा है.
खेतों में अन्न उगाकर दाना दाना दे जाता है
बाद में क़र्ज़ से खुद ही मर जाता है
हर छोटी-बड़ी घटना पर जो आवाज उठाते हैं
हमारे सनातन मौन से मुंह की खाते हैं.
कभी गाँव में कभी जंतर मंतर पर भीड़ लगाते हैं
अपना पेशाब पीकर हमें डराते हैं.


खुदकुशी करके हमारा क्या बिगाड़ लेंगे
हिंसक रूप धरकर भी हमसे क्या पा लेंगे
मारेंगे अपने ही भाई बिरादरों को!
पुलिस में सेना में उन्हीं के रिश्तेदार हैं
हम तो जाने -माने मक्कार हैं
उन्हीं के लिए गड्ढा खोद उन्हीं के घर खाते है
हर घटना पर 'कायराना हरकत है ' कह साफ़ मुकर जाते हैं.

कब तक उन्हें  सब्सिडी का चोखा खिलाएंगे
कभी तो उनको असली कीमत बताएँगे
वो कहते हैं गज़ब की मंहगाई है
जानते नहीं इसमें उन्ही की जग हंसाई है
सरकारी अस्पतालों में भीड़ लगाते हैं
कुछ हो जाए तो सरकार को गरियाते हैं

ये नहीं कि प्राइवेट डॉक्टरों के पास जाएँ
उन्हें  भी कुछ अच्छी  रकम खिलाएं
बच जाएंगे बच्चे तो क़र्ज़ भर ही देंगे
घर -खेत बेच-बांच शहर को चल देंगे
ऊंची ऊंची बिल्डिगों के लिए ईंट-गारा ढोएंगे
आसमान की चादर ओढ़ फुटपाथ पर सोयेंगे
खुशनसीब हुए तो मलबे में दब जाएंगे
भूख और बेहाली से छुट्टी पा लेंगे
न अनशन करेंगे , न हक़ के लिए लड़ेंगे
न शब्दों का आतंक फैलाएंएगे
न हमारे खिलाफ एकजुट हो पाएंगे।

हर पांच साल में चुनाव हो ही जाएगा
हम नहीं तो हमारा भाई बंधु ही आएगा
कुछ हमने खाया कुछ वो भी खायेगा
मंच पर न सही बाद में हमारा ही गुण गाएगा।
हमें क्या हम तो जब चाहे कार्ड स्वाइप कर लेंगे
उन्ही के पैसों से अपनी जेबें भर लेंगे।
उन बेवकूफों को कौन समझाए!
घर में , खेत में, गली में,चौक में
ज़िंदाबाद - मुर्दाबाद कर हमारा क्या बिगाड़ लेंगे
हम तो जब चाहे उड़ान भर लेंगे।

(Image credit to google)



















Wednesday, September 6, 2017

गौरी लंकेश की मौत पर (On the death of Gauri Lankesh)




तुमने एक सच को मारना चाहा
वो तुम्हे मरकर भी अंगूठा दिखा रहा है!
कलम है, रुक नहीं सकती
शब्द मौन नहीं हो सकते
कितनी ही कर लो कोशिश
दबा लो गला
काट दो नाड़ी
विक्षिप्त घोषित कर दो
ओढा दो कफ़न
दफ़न नहीं कर सकते सच्चाई.
खुश भले हो लो दो-चार को मार कर
कॉलर खड़ी कर लो अपने आप खुद की
वाह वाही बटोर लो कायरों की
क्या आइना दिखा पाओगे खुद को?
अपना ही चेहरा वीभत्स नहीं दिखेगा तुम्हे!
जिस दिन खड़े होगे अपने सामने
अपना आप बहुत बौना लगेगा,
अपनी हरकतों से पैसे भले ही बटोर लो
अपनी ही नज़रों में नंगे हो जाओगे.

(picture credit to google)