Wednesday, December 13, 2017

मरे हुए लोग


मरे हुए लोग
मरते हैं रोज-रोज
थोड़ा- थोड़ा,
अपनी निकलती साँसों के साथ
मर जाता है उनका उत्साह,
हंसते नहीं है कभी
न ही बोलते है,
अपनी धड़कनों के साथ
बजता है उनका शरीर
जैसे पुराने खंडहरों में
तड़पती हो कोइ आत्मा.
मरे हुए लोग,
जल्दी में रहते हैं हमेशा,
चलते रहते हैं पूरी ज़िंदगी
पर कंही नहीं पंहुचते.
मरे हुए लोगों की अंत्येष्टि नहीं होती,
मुक्त नहीं होती उनकी रूह
मर जाती है शरीर के साथ.
ये मरे हुए लोग,
श्मशान नहीं ले जाए जाते,
बस!
दफ़ना दिए जाते हैं अपने ही घरों  में.

(picture credit google)


Monday, December 11, 2017

पीठ या चेहरा.....


सोचती हूँ.... 
कितनी भद्दी हो गयी होगी मेरी  पीठ
तुम्हारी पिटाई से,
लगातार रिसते ख़ून के धब्बे,
नीलशाह, अनगिनत ज़ख्म...........

फिर सोचती हूँ....
तुम्हारे चहरे से ज्यादा भद्दी तो न होगी
कितना कुरूप लगता था तुम्हारा चेहरा ;
मुझे पीटते वक्त,

पीठ तो पीठ है
और चेहरा है : 
मन का दर्पण 
कुरूप कौन? 


(image source google)


Saturday, December 9, 2017

' ए फॉर एप्पल' नहीं 'ए फॉर अनन्या'


सीकचों से झांकती हुई नन्ही परी 
इशारा करती है
बुलाती है मुझे 
बुदबुदाती है धीरे से मेरे कान में 
मुझे भी आता है 'ए फॉर एप्पल '
नम्बर्स भी; पूरे हंड्रेड तक!
एक बड़ी सी मुस्कराहट के साथ 
सरगोशी करती है,
एक बुक भी है मेरे पास;
बड़े- बड़े चित्रों वाली 
रंगीन!
रद्दी से चुन कर लाये थे पापा
और एक पेन भी,
चमकते हुए नीले रंग का..... 
मझे पढ़ना भी आता है 
और बोलना भी,
बस स्कूल नहीं जाती
चल नहीं सकती न........
तो क्या हुआ!
एक दिन मै भी किताबें लिखूँगी,
बताऊंगी सबको,
'ए फॉर अनन्या' भी होता है 
और 'अ से अनन्या' भी.... 
फिर हर किताब में 
एप्पल और अनार की जगह 
मेरी फोटो छपेगी
मेरा नाम 'अनन्या' है न!

(Picture credit google)



Friday, December 8, 2017

इंसानों के बीच एक दिन


गलियों में घूमते हुए 
बरबस ही खींचती है गरम - गरम भात की महक,
दरवाजा खुला ही रहता है हमेशा 
यहाँ बंद नहीं होते कपाट 
चोर आकर क्या ले जायेंगे.
जिस घर  चाहूं घुस जाऊं 
तुरत परोसी जायेगी थाली 
माड़ - भात, प्याज, मिर्च के साथ 
हो सकता है रख दे हाँथ पर गुड़ कोइ 
और झट से भाग जाए झोपडी के उस पार.
यंहा भूखे को प्यार परोसा जाता है
भर- भर मुट्ठी उड़ेला जाता है आशीर्वाद.
फसल काटने के बाद 
नाचते है लोग 
घूमते हैं मेला 
प्रेमी युगल आज़ादी  से चुनते हैं अपना हमसफ़र 
दीवारें नहीं होती यंहा 
मज़हब और जाति की 
जब तक घर में धान है 
हर घर है अमीर 
धान ख़तम, अमीरी ख़तम 
फिर वही फ़ाकामस्ती
वही दर्द , वही दवा 
इनकी ज़िंदगी खदबदाती है खौलते पानी में,
पानी ठंढा हुआ जीवन आसान 
पानी के तापमान के साथ 
घटता- बढ़ता है सुख-दुःख 
पानी जैसे ही बहता है जीवन 
पानी जैसा मन 
जिस बर्तन डालो 
उस जैसा तन.

(Image credit google)





Wednesday, December 6, 2017

कीमती है!



अन्न धन है 
अन्न मन है 
अन्न से  जीवन सुगम है 
अन्न थाली 
अन्न बाली 
अन्न बिन धरती है खाली 
अन्न धर्म  है 
अन्न मर्म है 
अन्न ही सबका कर्म है  
अन्न संस्कार है 
अन्न बाज़ार है 
अन्न ही सबका त्यौहार है 
एक-एक दाने की कीमत 
खुदकुशी और मौत है 
भूख और बाज़ार 
धर्म और संस्कार में 
झोपड़ी और गोदाम में 
अन्न खुशी का आधार है। 

(Picture credit to Malay Ranjan Pradhan's FB wall)

बाकी है अब भी!


जब- जब तुम्हे मिलने निकलती हूँ
बादलों के मेलें में गुम हो जाती हूँ
तुम, चाँद बन इठलाते हो,
खेलते हो छुपंछुपाई
हवा के झूलों पर उड़ती हूँ
दौड़ती हूँ तुम्हे छूने को 
हज़ार कोशिशें करती हूँ 
और तुम!
भागते हो मुझसे दूर
अमावस की चादर तले
छुपते हो 
निहारते हो चोरी- चोरी
मेरे एहसास में गुम हो तुम भी 
फिर; ये कैसा खेल?
बाकी है अब भी 
प्रेम का प्रकटीकरण।।।।  


(picture- google)

Tuesday, December 5, 2017

टहनियों की पंहुच



उसके साथ आलिंगनबद्ध होने पर भी,
खींच ही लाती हैं मेरी टहनियां तुम्हे
और वो तकती है मेरी राह
कि कब पंहुचेगे मेरे हाथ उसके तने तक
जानती नहीं
परजीवी हूँ 
जीती हूं तुम्हारा ही रस पीकर
तुम्ही से है मेराअस्तित्व
और वो!
धरा है
तुम्हारा आधार
छोड़ नहीं सकते उसे
और मुझे भी
तुम उससे जीते हो
और मै तुमसे.

(image credit google)

    

Sunday, December 3, 2017

नाक और इशारे


इशारे
कर सकता है कोइ भी,
विद्यालय का प्रधानाचार्य,
आफिस में बॉस
बाप की उम्र का पड़ोसी
साथ बैठ कर काम करने वाला कलीग
कभी कभी रिक्शेवाला भी.
इशारे करना अफोर्ड कर सकता है हर मर्द
गरीब-अमीर, मालिक -नौकर, आफीसर- मजदूर
नपुंसक भी........
क्योंकि इशारों के बीच नाक नहीं आती!!!!
नाक!
हाँ नाक
इशारे करने में नाक नहीं कटती......
साक्ष्य नहीं होता कोई भुक्तभोगी के पास,
भद्दे इशारे करने के बाद भी;
आप दिख सकते है सभ्य
चल सकते हैं सीना तान,
खुद पर पर्दा डाल लानत-मलामत कर सकते हैं अपने जैसों की.
नाक कटती है उसकी जो करता है विरोध,
जीने नहीं देता समाज
मुंहजोर है, बढ़ाती है बात
यही संस्कार दिए हैं माँ-बाप ने
माँ-बाप की भी कट जाती है नाक
न जाने बेटियों की कुर्बानी कब तक लेती रहेगी नाक!
और; अश्लील हरकतें, भद्दे इशारे करने वाले
नुमाइश करते फिरेंगे अपनी सही-सलामत नाक की.  

(Image credit google)


Wednesday, November 29, 2017

बिनब्याही


बार- बार उलझ जाती हैं बुआ की नज़रें 
लाल-लाल चूनर में,
पैंतालीस की उम्र में भी बुआ;
झांकती हैं धीरे से झरोखा 
कि देख न ले कोई कुंआरी लड़की को झांकते हुए,
दरवाजे पर आज भी नहीं खड़ी होती,
चुपचाप हट जाती हैं पति या प्रसूति से जुड़ी बातों को सुन,
आज भी लजाती हैं बुआ किसी बंशीवाले की धुन पर, 
छत के उस पार चुपचाप बैठी मिलती हैं कभी- कभी,
हांथो की लकीरों में खोजती हैं ब्याह की रेखा,
दादी अब भी रखवाती हैं सोमवार, गुरुवार के व्रत,
बेटी की पेटी के लिए सहेजती हैं हर नया कपड़ा,
बाबा हर साल बांधते हैं उम्मीद,
इस साल ब्याह देंगे बेटी को जरूर,
न बाबा का कर्ज उतरता है न आती है बरात,
बीतते जाते हैं साल दर साल,
बढ़ती जाती है उम्मीदों की मियाद,  
बुआ हर रात करवटें बदलती हैं, 
देखती हैं सपना
लाल-लाल चूनर का, 
पति और ससुराल का, 
बच्चे और गृहस्थी का......... 
हे -हे -हे 
अब भी नासमझी करती हैं बुआ,
जानती नहीं
कितने मंहगे हैं दूल्हे इस बाज़ार में.


(image credit google)





Monday, November 27, 2017

#चुनाव


बड़ी बेपरवाह हो!



वो आख़िरी चुम्बन तुम्हारा 
और झटके से पलट जाना 
भूलता क्यों नहीं?
सरे बाज़ार उठ कर चली आती हो,
पकडती हो हाँथ और खींच लेती हो मुझे मेरे समय से.
अतीत हो जानता हूँ,
छू नहीं सकता तुम्हें अब 
सोचना भी पाप है ....
पर तुम!
बड़ी बेपरवाह हो, 
खींच ले जाती हो अपने सहन में.
सर्दी की सुबह,
मेरे ही कप में सुड़कती हो चाय, 
अपने गर्म हांथों में छुपाकर 
मेरी बर्फ सी हन्थेलियाँ
गायब हो जाती हो मेरे वजूद में.
भागता हूँ जब भी हार कर मै,
जीवन की प्यास से सराबोर कर देती हो. 
मेरे आईने पर चिपकी हो इस तरह; 
कि मुझमे भी तुम दिखती हो.
खिलखिलाती हो मेरे डर पर 
पसार बांहे थाम लेती हो मुझे मोहपाश में. 
होना चाहता हूँ जितना भी दूर;
उतना ही करीब आ जाती हो.....
डराती हो ,धमकाती हो, 
मेरे दिन पर छा जाती हो,
सामने हो मेरे, बस एक कदम दूर 
हर सांस मुझ में एकसार हो जाती हो.

(Image credit google)
  


Tuesday, November 21, 2017

मृत्यु से पहले की उम्मीद ( #Road Accident)



दूर हूँ बहुत 
उनसे ,तुमसे ,खुद से, 
अपनी ही साँसे पता नहीं चल रहीं, 
नहीं मालूम दिल धड़क भी रहा है या नहीं,
जानता हूँ, ज़िंदा हूँ अभी 
लहू- लुहान पड़ा हूँ
आँखें बंद, होंठ खामोश 
प्यास का लहलहाता समंदर 
बस जीने की तड़प है बाकी है,
न जाने कौन आयेगा सड़क के इस पार, 
बचाएगा मुझे; या मुंह फेर चला जाएगा अपनी राह,
जैसे मैं गुज़र जाता था सड़क पर पड़े घायलों को देख,
जानता हूँ व्यस्त हैं सब, 
मर गयी है सम्वेदना, 
फिर भी है उम्मीद........ 
कोई न कोई बचा ही लेगा 
ज़िंदा होगा इंसान किसी न किसी शरीर में जरूर...
और अगर न बचाए कोइ मुझे;
हे इश्वर!  ये उम्मीद बचाए रखना 
कि ज़िंदा है इंसानियत इंसान के भीतर।

(Image credit google)


Sunday, November 19, 2017

प्रेम के हरे रहने तक!


पलाश के लाल-लाल फूल 
खिलते हैं जंगल में,
मेरा सूरज उगता है 
तुम्हारी आँखों में,
मांग लेती हूँ धूप  थोड़ी सी तुमसे;
न जाने कब,
हमारे प्रेम का सूरज डूब जाए 
मुरझा जाएँ पलाश 
मरणासन्न हो जाये जंगल,
कोशिश है
खिले रहें पलाश ,
हरा रहे जंगल 
बची रहे तुम्हारी धूप
मेरी मुट्ठी में ताउम्र।   

(image credit google)

Friday, November 17, 2017

लंच बाक्स से झांकता है समाजवाद


बच्चों के लंच बाक्स से झांकता है समाजवाद,
कि कुछ डिब्बों में रखी होती हैं करारी- कुप्पा तली हुयी पूरियां 
और कंही, 
चुपके से झांकती है तेल चुपड़ी तुड़ी-मुड़ी रोटी,
कुछ बच्चे खाते हैं चटखारे लेकर-लेकर 
बासी रोटी की कतरने, तो कुछ;
देशी घी में पगे हलवे को भी देखकर लेते हैं  
ऊब की उबासी,
ये सिर्फ लंच बाक्स नहीं हैं ज़नाब!
ये हैं उनकी बाप की कमाई का पारदर्शी नक़ाब,
माँ की सुघड़ता का नमूना,
और कुक की नौकरी कर रही माओं की मजबूरी लिखी स्लेट;
जो दूसरों के टिफिन को लज़ीज़ पकवानों से सजाने से पहले, 
जल्दी-जल्दी ढून्सती हैं अपने बच्चों के टिफिन में 
रात के बचे चावलों को बिरयानी की शक्ल में;
और करती हैं मनुहार,
प्यार से खाली कर देना डब्बा;
वरना मेरी आत्मगलानि मुझे जीने नहीं देगी। 

Sunday, November 12, 2017

कविता के मायने


कविता के सिरहने पड़ी हैं
कितनी अबूझ पहेलियाँ,   
मेरा- तुम्हारा प्रेम,
हमारे सीले दिनों की यादें,
दर्द सिर पर रखे भारी समझौतों वाले दिन;
और कविता के पैताने!
वो हाँथ जोड़ कर बैठना,
कि एक दिन लौट आयेंगे हमारे भी दिन,
टपकना बंद हो जाएगा बरसात का पानी 
बच्चे के सिर पर,
मेघ करेंगे धरती से प्रेमालाप, 
हरियाली चादर ओढ़;
धरा करेगी स्वागत हमारी उम्मीदों का,
खाली पड़ी बखार भर जायेगी अनाज से, 
हम खरीदेंगे अपने सपने अनाज के बदले, 
निखर जायेगी हमारी भी ज़िंदगी;
हम बैठे ही रहे कविता के सिरहने - पैताने,
और कविता!
अट्टालिकाओं की हो गयी........ 
हम गूंथते ही रहे अक्षर- अक्षर खाली स्लेटों पर
और कविता!
चिढ़ा गयी हमें हमारी खुरदुरी हथेलियां देख,
कविता कैद हो गयी महलों में, तिजोरियों में,
और हम!
बाट जोहते रहे अपनी झोपड़ी के बाहर।।

(picture credit google)

Saturday, November 11, 2017

स्टेशन पर बाल दिवस (लघुकथा)


कल छुट्टी मिलेगी साहब , राजू ने सकुचाते हुए पूछा। कैसी छुट्टी? "परसो ही तो आया है तू काम पर वापस और फिर छुट्टी माँगने लगा.अब क्या काम आ गया". सेठ फूलचंद ने रुपए गिनते हुए कहा. राजू कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा फिर बोला।अच्छा साहब आधा दिन की छुट्टी दे दीजियेगा, मै रात में सारा काम निपटा दूंगा" राजू ने आवाज में थोड़ी हिम्मत भरकर कहा. सेठ फूलचंद ने इस बार राजू को  गौर से देखा और बोले ," देखो राजू तुम मुझे सच सच बताओ तुम्हे छुट्टी किस लिए चाहिए। हो सकता है मै तुम्हे पूरे दिन की छुट्टी दे दूँ." सेठ फूलचंद इस बार थोड़े प्यार से बोले।
साहब कल मेरे सारे दोस्त चाचा नेहरू का जन्मदिन मनाना चाहते हैं. मेरे सब दोस्त कल काम से छुट्टी लेकर एक साथ इकट्ठे होंगे। फिर हम उत्सव शुरू करेंगे। सेठ फूलचंद को थोड़ा अजीब लगा. ये मलिन बस्ती में रहने वाले बच्चे जो स्कूल जाते नहीं हैं बाल दिवस क्यों और कैसे मनाएंगे? सेठ जी बोले ," राजू तुम तो स्कूल जाते नहीं हो , फिर चाचा नेहरू का जन्म दिन कैसे मनाओगे। जानते भी हो नेहरू जी कौन थे? 
राजू हंसने लगा. क्या साहब, आपको इतना भी नहीं पता. हम स्कूल नहीं जाते तो क्या हुआ. बाल दिवस तो सब बच्चों के लिए होता है। कल रेडियो में एक दीदी बता रहीं थी कि चाचा नेहरू हमारे देश के पहले प्रधान मंत्री थे और सब बच्चों से प्यार करते थे, केवल स्कूल जाने वाले बच्चों से ही नहीं। तो सब बच्चों को उनका जन्म दिन मनाना चाहिए। मेरी बस्ती के सब बच्चे कल रेलवे स्टेशन पर जाकर प्लेटफॉर्म को साफ़ करेंगे और गिफ्ट बांटेंगे। लेकिन इतने गिफ्ट तुम लोग कंहा से लाओगे ? सेठ ने आश्चर्य चकित होकर पूछा।
राजू  बोला," साहब, हम सब दोस्त रोज रात में काम से वापस जाने के बाद लिफाफे ( ठोंगा /पेपर बैग ) बनाते हैं और उनको  दुकानों पर बेंच देते हैं। जिससे हमें कुछ पैसे मिल जाते हैं। हमने सोचा है आज रात में हम जितने भी लिफाफे बनाएंगे वो स्टेशन पर आने जाने वाले बच्चों को एक -एक लिफाफा गिफ्ट में देंगे और उनसे कहेंगे कि वो लोग जब भी कोइ सामान खरीदें प्लास्टिक बैग न मांगे। 
इस तरह कल स्टेशन पर हम सब दोस्त पूरा दिन साथ में रहेंगे और साथ में काम करेंगे . मजा भी आएगा और सफाई भी हो जाएगी। हमारे लिए तो दोस्तों के साथ रहना और अपनी मर्जी से काम करना ही उत्सव है साहब! 
"क्या ये सब चाचा नेहरू को अच्छा नहीं लगेगा साहब " राजू ने बड़ी मासूमियत से पूछा। सेठ फूल चंद ने प्यार से राजू के गाल थपथपाये और कहा," जाओ  राजू तुम्हारी अभी से छुट्टी। मना लो बाल दिवस अपने दोस्तों के संग अपनी मर्जी से। तुझे स्कूल की क्या जरूरत। तू तो खुद ही चलता - फिरता स्कूल है और हाँ इस छुट्टी के पैसे भी नहीं कटेंगे".  
बाल दिवस शुरू हो चुका था राजू की ज़िंदगी में भी और सेठ की ज़िंदगी में भी।    
     (pic credit google)

Wednesday, November 8, 2017

सरकारी दस्तावेज़ों में थर्ड जेंडर हूँ!


न औरत हूँ न मर्द हूँ 
अपने जन्मदाता का अनवरत दर्द हूँ. 
सुन्दर नहीं हूँ , असुंदर भी नहीं 
हुस्न और इश्क का सिकंदर भी नहीं।
मखौल हूँ समाज का, हंसी का लिबास हूँ,
गलत ही सही ईश्वर का हिसाब हूँ.
जान मुझमें भी है, संवेदना भी 
जन्म भले न दूं, पालक लाज़वाब हूँ.
हंसते हो , खिलखिलाते हो,मजाक बनाते हो,
तुम्हारी नीचता का क़रारा जवाब हूँ.
तुम्हारे जन्म पर तालियाँ बजाता हूँ,
अपने होने की कीमत मांग जाता हूँ,
मर्द का जिगर हूँ , औरत की ममता हूँ 
पके हुए ज़ख्म सा हर पल रिसता हूँ
देहरी और दालान के बीच में अटका हूँ 
पाच उँगलियों के साथ छठी उंगली सा लटका हूँ.
चंद सिक्के फेंक कर पीछा छुड़ाते हो,
क्यों नहीं मेरा दर्द थोड़ा सा बाँट जाते हो.
मुझमें भी साँसे हैं, मेरे भी सपने हैं,
पराये ही सही कुछ मेरे भी अपने हैं,
प्यार की झप्पी पर मेरा भी हक़ है,
इज्जत की रोटी मुझे भी पसंद है. 
नागरिक किताबों में बोया हुआ अक्षर हूँ,
पूरे लिखे पत्र का जरूरी हस्ताक्षर हूँ.
नर और नारायण के बीच का बवंडर हूँ 
सरकारी दस्तावेज़ों में थर्ड जेंडर हूँ.





Monday, November 6, 2017

रंगमंच पर टंगे चेहरे (लघुकथा )



1.
रौशनी से नहाये हुए मंच पर परियां खिलखिलाती हैं, झूमती हैं, मस्तानी अदाएं दिखाती है.
सीटी बजाते हैं लड़के, पीछा करते है, छेड़ते हैं, आहें भरते हैं
रंगीन गुब्बारों को हवा में उड़ाकर;
प्रेम का इज़हार करते हैं.
२.
हाँथ में कटोरा लिए वृद्ध कांपता है, ठिठुरता है, पेट पकड़कर बैठ जाता है कूड़ेदान के सहारे. तभी बड़ी सी कार से एक जोड़ा निकलता है हांथों में हाँथ डाले और ......स्नैक्स का खाली पैकेट वृद्ध के चहरे पर फेंकता हुआ निकल जाता है अपनी दुनिया में......
3.
दुधमुहे बच्चे को पेड़ के नीचे लिटाकर होंठो पर लिपस्टिक पोतती है वैश्या,
सड़क के किनारे खड़े होकर अश्लील इशारे करती है, पटाती है ग्राहक,
खरीदती है दूध का पैकेट और गुम हो जाती है बस्ती की ओर जाती हुई पगडंडी पर.....
 4.
मंच पर अपने संवाद बोलते-बोलते अचानक रुक जाता है कार्तिक. इधर –उधर देखता है और फिर अपने संवाद बोलने लगता है. पर्दे के पीछे खलबली मच जाती है. अचानक मंच पर अँधेरा हो जाता है और कार्तिक के चेहरे पर सीधे रोशनी पड़ती है. दर्शक अब सिर्फ कार्तिक का चेहरा देखते हैं, कुछ बुझा सा,कुछ उदास. कार्तिक अपने वस्त्र खोल देता है, रोशनी उसके पूरे शरीर पर पड़ रही है. बड़े बड़े फफोले, कंही कंही से खून रिसता हुआ. कार्तिक तड़पता है, तेज चीत्कार के साथ गिर पड़ता है और उसके मुंह से झाग निकले लगती है . दर्शकों के बीच पिन ड्राप साइलेंस. पर्दे के पीछे से लोग दौड़ कर आते हैं. अरे! इसे आज ही जहर खाना था और ठीक मंच पर आने के पहले?
कंही से आवाज आती है, एम्बुलेंस! एम्बुलेंस
दर्शक खड़े हो जाते है. और आप................

(image credit google)

Friday, November 3, 2017

मर्द हूँ, अभिशप्त हूँ


मर्द हूँ, 
अभिशप्त हूँ, 
जीवन के दुखों से 
बेहद संतप्त हूँ। 
बोल नहीं सकता 
कह नहीं सकता 
सबके सामने 
मै रो नहीं सकता.
भरी भीड़ में रेंगता है हाँथ कोई 
मेरी पीठ पर;और मैं
कुछ नहीं बोलता,
कह नहीं सकता कुछ; 
भले ही बॉस की पत्नी 
चिकोटी काट ले मेरे गालों पर सरेआम
मै चुप रहता हूँ;जब मेरी मां 
ताना देती है मुझे 
अपने ही बच्चे का डायपर बदलने पर....
रात भर बच्चे के साथ जगती पत्नी 
कोसती है मुझे 
और मै कुछ नहीं करता
आज तक नहीं सीख पाया 
नन्हे शिशु को गोद में लेना
कान में गूंजती है माँ की हिदायत 
गिरा मत देना बच्चे को;
और मै
सहम कर छुप जाता हूँ 
चादर के भीतर
भले ही तड़पता रहूँ पत्नी और बच्चे के दर्द पर.
सोशल मीडिया के पन्ने 
भरे हैं औरत के दर्द से; और मै  
चुपचाप कोने में खड़ा हूँ. 
दिन भर खटता हूँ रोजी कमाने को 
फिर भी; सामाजिक भाषा में 
मै बेवड़ा हूँ.
मालिक हूँ,
देवता हूँ,
पिता हूँ ,
बेटा हूँ,
हर रिश्ते में बार-बार पिसा हूँ. 
मर्द हूँ,
अभिशप्त हूँ 
जीवन के दुखों से 
बेहद सन्तप्त हूँ। 

(Image credit google)

Thursday, November 2, 2017

लघुकथा - अफ़वाह के हाँथ



लघुकथा - अफ़वाह के हाँथ
क्या खाला, बस इतनी सी सब्जी, थोड़ी और दो न! रेहाना मिन्नत करती हुई बोली. "न और नहीं, दोपहर को भी खाना है, तुम्हारे खालू अभी दूकान से आकर खायेंगे.आज कुछ और सब्जी भी नहीं है,गैस भी ख़त्म होने वाली है.सिलेंडर दो दिन बाद ही मिलेगा. कुछ और नहीं बना सकती", खाला उसे समझाते हुए बोली. अच्छा खाला, मै खालू के साथ फिर खालूंगी, रेहाना उठ कर अपनी किताबें संभालने लगी.
खाला जूठे बर्तन उठाकर रख रही थी तभी बाहर कुछ शोर सुनाई पड़ा. रेहाना और खाला दोनो दौड़ कर बाहर आयी. तब तक कुछ लोग घर के अन्दर आ गए और उनका सामान उठा कर फेकने लगे.रेहाना रोने लगी. खाला कुछ समझती तब तक उनके घर में उन लोगों ने आग लगा थी.
आसपास पास पूरा गाँव उमड़ कर आ गया था .घर जल कर राख हो चुका था. खाला का रो-रो कर बुरा हाल था.वसीम मियाँ की लाश घर के बाहर रखी थी. उन्हें लोगों ने भरे चौराहे पर पीट-पीट कर मार दिया था. पुलिस आकर भी उन्हें नहीं बचा पायी थी. उम्नादी भीड़ ने अपनी मनमाने की थी. कल किसी ने व्हाट्सएपर अफवाह फैलाई थी कि वसीम मियाँ अपनी दुकान पर गाय का मांस बेचते हैं.

रामेश्वर जोर जोर से चिल्ला रहा था, वसीम मियाँ ऐसा कभी नहीं कर सकते. वो तो रोज गाय को रोटी खिलाने के लिए मेरे घर आते थे.

Saturday, October 28, 2017

भूख का इंकलाब!


जब तुम दलीलें दे रहे थे 
भूख से नहीं मर रहे बच्चे, रिक्शा चालाक और मजदूर,
तब सड़क पर खड़े एक भिखमंगे ने 
फेंक दिया था खोलकर 
अपने शरीर पर बचा 
एक मात्र अधोवस्त्र,
खड़ा हो गया था नंगा 
शासन के ख़िलाफ़!
कि नंगे का सामना 
नंगा ही कर सकता है,
भूख भूखे को ही जिबह करती है,
लील लेती है बेरोजगारी 
मासूम युवा को 
फंदे की शक्ल में.
भूख से आदमी नहीं मरता;
मरती हैं अंतड़ियां,
सूख जाता है रक्त 
गायब हो जाता है शरीर का पानी,
तब मौत का कारण 
कुछ और दर्ज किया जाता है,
'भूख' बिलकुल नहीं। 

तुम सच कहते हो मंत्री महोदय!
आज तक एक भी मौत भूख से नहीं हुई,
मौतें हुयी हैं तुम्हारे नंगेपन से,
जब मर गया तुम्हारा ज़मीर,
अंधी व्यवस्था ने निगल ली ईमानदारी,
आदमी भेड़-बकरियों की तरह खड़ा हो गया लाइन लगाकर,
बच्चों ने जान दे दी 
तुम्हारी वफादारी देखकर,
मशालें जल गयीं इंकलाब की,
जी हां, ये भूख का इंकलाब है!!

(Image credit google)



Tuesday, October 24, 2017

पत्थर होना भी आसान नहीं होता. #Rock



तमाम बहस मुबाहिसों को भुलाकर
हम पत्त्थर हुए थे,
सोचा था
उगने देंगे एक भी भाव कमजोरी का,
एक भी पल याद करेंगे
अपना जख्म,,
अगर उगने लगेगी घास मुझ पर;
नमी नहीं सोकने देंगे उसे.
ही पड़ने देंगे परछाई फूलों की,
मिट्टी की परत जब जब जमेंगी
बारिश को बुला
तहसनहस करा देंगे उसका अस्तित्व........
पर पत्थर बनना आसान न था!
बची रह ही गयी थी नमी कंही
और शायद मिट्टी भी........
उड़ आए बीज कंही से;
कि लाख कोशिशों के बावजूद
उग ही आये कुछ अंकुर
बातें करने लगे हवा से
नाता जोड़ लिया इस धरा से,
गगन से और इंसानों से.......
और हम!
अपनी कोशिशों में भी हारते रहे..... 
कि पत्थर होना भी आसान नहीं होता..
 
( image credit google)