Z

Friday, January 12, 2018

मुक्ति!


प्रेम की कश्ती समन्दर ले चला है
और ममता खोजती है छाँव अपनी
अश्क सारे बन रहे अवलंब अपने
दास्तां किसको सुनाये मोह बंधन.

है अगर ये प्रीति सच्ची देह की
तो तुम्हे हम रोक लेंगे मार्ग में ही
हाथ थामे रूह से चलकर मिलेंगे
और उसको सौंप देंगे प्रीति अपनी.

लो संभालो नेह के बंधन रसीले
हम हुए अब मुक्त इस स्थूल जग से
ले चलो गन्तव्य तक अब साथ दो तुम
थक गया हूँ मैं बहुत अब थम लो तुम.

जग है मिथ्या, तन है मिथ्या और मिथ्या रीतियाँ सब
सिर्फ सच्ची रूह है और उसकी खूबियाँ सब
एक डगर जाती वंहा है सब है राही उस डगर के
एक मंजिल , एक मकसद, एक ही रब है सभी के 
छोड़ दो ये आपाधापी , उसकी डोरी थम लो अब 
तोड़ कर सब अर्थ बंधन मुक्त हो कर सांस लो अब.  

(image credit google)




Thursday, January 11, 2018

चाय वाली सुबह! #Tea



तुम्हारी आवाज़ में उगता है मेरा सूरज 

चाय बनाते हुए जब गुनगुनाती हो भोर का गीत
रात के कांटो से फूलों के गलीचों पर उतर आता हूं,
उस फ़ानूसी कप में जब थमाती हो मुझे गर्मागर्म चाय..
मै.... जैसे लौट आता हूं भटकती राहों से,
रात का सपना हो या दिवास्वप्न
मशीनों के साथ जूझते वक्त में
तुम्हारी चाय!
मुझे ज़िंदगी सौंपती है,
जुबां पर इसका स्वाद और तुम्हारी नज़रों की मिठास
पोछ डालती है तल्ख एहसासों को,
हर रोज......  एक और दिन मिलता है जीने के लिये,
सुबह की ये चाय और तुम्हारा साथ....
ज़िंदगी बस इत्ती सी तो है.

(image credit google)

Sunday, January 7, 2018

प्रेम खुद से!


प्रेम के बेतहाशा उफ़ान पर 
उड़ जाती है परवाह!
प्रेम खुद से........  दे जाता है उपहार 
खुद को पा लेने का
प्रेम की राह आसान नहीं
बंदिशें हैं,जिम्मेदारियां हैं
नजरें हैं, सवाल हैं, संदेह हैं
प्रेम ही ज़वाब है... 
प्रेम सच्चा है तो आत्मविश्वास है 
प्रेम उल्लास का राग है
प्रेम ही अलाप है 
प्रेम खुद की रूह का एकालाप है
प्रेम खोल देता है दरवाजे बुलंदियों के 
प्रेम की पदचाप;
मधुर है पर है कठिन 
अजीब है पर सच्ची है
प्रेम की राह पर........ चलते चलें 
इस भीड़ में ज़रा खुद को पाते चलें। 

(Image credit google)

Thursday, January 4, 2018

नदी बहती रहे!


बहती हुयी नदी 
अपने साथ लाती है संस्कृतियों की बाड़, 
न जाने कितने संस्कारों की साक्ष्य बनती है,
जीवन के हर कर्म के साथ साथ रहती है 
प्रेम में पगे जोड़ों के ख़ूबसूरत एहसास 
बहे चले आते हैं नदी के साथ......... कि 
बस जाती है पूरी की पूरी सभ्यता...
विकसित होती हैं परम्पराएं,
नदी के पेट में सिर्फ पानी ही नहीं होता,
दफ़्न  होते हैं न जाने कितने राज़ भी........ 
पहाड़ी साँझ का सूर्य भी बहा चला आता है,
मैदानों के बाजारों में काम की तलाश करता है
खोजता है जीवन की उम्मीद .....कि
ज़िंदगी बहती रहे नदी के साथ.
बड़ी -बड़ी चट्टानें पानी के साथ बहते हुए;
भूल जाती हैं अपना शिलापन,
हजारों मील के सफर में 
गायब हो जाता है उनका नुकीलापन
छोटे-छोटे चिकने पत्थर बन  
नन्हे हांथों के खिलौने हो जाती हैं,
नदी ही धार.... 
कभी काटती है, उखाड़ती है 
तो कभी बसाती है.... 
भूख में ,प्यास में ,सृष्टि के विकास में 
नदी ही सहारा है,
बची रहेगी नदी तो बची रहेंगी सभ्यताएं,
नालों में तब्दील होती नदियाँ 
दे रहीं दरख्वास्त!
ज़िंदा रखो हमें भी 
अपने साथ -साथ।।

(picture credit google)



  

Friday, December 29, 2017

कब्ज़ा (लघु कथा )


रफ़ीक मियाँ कोर्ट के बाहर बुरी तरह से चीख रहे थे और अपने कपड़े नोच रहे थे.भीड़ आस पास तमाशा देखरही थी. कोइ बोला,”सत्तर बरस का बूढ़ा रोड पर नंगा होकर क्या कर लेगा...... फिर भी चिल्लाने दीजिये शायद हमारे देश की न्याय व्यवस्था को शर्म आ जाए!
पूरी ज़िंदगी गुजार दी रफीक मियाँ ने सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाते लेकिन टस से मस न हुआ था उनकी जमीन पर अवैध कब्जा करने वाला संग्राम सिंह. रफीक के बाबा ने कितनी हसरत से शहर में जमीन खरीदी थी कि उनके बाल -बच्चों को किराए के मकान में होने वाली किच-किच से न जूझना पड़े. जमीन खरीदने में ही बूँद-बूँद जमा की गयी बचत खर्च हो गयी थी. बेचारे जमीन पर बाउंड्री भी न पाए थे और अल्लाह को प्यारे हो गए थे. रफीक के अब्बाजान सऊदी चले गए थे जब वो अपनी अम्मी के गर्भ में ही था. वंहा वे किसी फैक्ट्री में जाने क्या काम करते थे कि जब भी फोन पर बात करते तो कहते कि घर वापस आने के लिए पैसे जमा कर रहे हैं. पर न पैसे जमा हो पाए और न वो घर आये. एक दिन पड़ोस के बब्बन  चचा ने खबर दी कि उनकी रोड एक्सीडेंट में मौत हो गयी है. अम्मी ने उन्हें वहीं सुपुर्दे खाक करने की इजाज़त दे दी. अब उम्मीद भी ख़त्म हो गयी थी अब्बा के लौट आने की. रफीक मियाँ उस समय सत्रह बरस के थे.
अब रफीक ने भी एक गैराज में काम करना शुरू कर दिया था. इतने दिनों से अम्मी दूसरों के घर काम करके किसी तरह से उन्हें पाल रहीं थी और एक सपना देख रही थीं कि एक दिन उनका अपना घर होगा और रफीक वंही अपना गैराज खोलेगा .
लगभग दस साल पहले  संग्राम सिंह ने उसकी अम्मी से उस जमीन पर एक छोटी सी दूकान खोलने की इजाज़त ली थी और वादा किया था कि वे जब कहेंगी वो जमीन खाली कर देगा.अब रफीक जब भी संग्राम सिंह से कहता कि उसकी जमीन खाली कर दे तो वो कहता ही तुम पैसे जमा करो जब तुम्हे घर बनाना होगा तब मै जमीन खाली कर दूंगा. एक ही गाँव से होने के कारण रफीक उसकी बात विश्वास कर लेता.
धीरे-धीरे संग्राम सिंह के तेवर बदलने लगे थे. एक दिन रफीक उसके पास गया तो संग्राम सिंह ने उसे बहुत धमकाया और उसे वंहा से भगा दिया. रफीक समझ गया था कि अब जमीन उसके हाँथ से गयी.
उसने संग्राम सिंह के खिलाफ मुकदमा कर दिया था ये सोच कर कि उसके पास जमीन के असली कागज़ है और इस बिना पर कोर्ट से उसे न्याय जरूर मलेगा. पिछले तीस सालों से वो कोर्ट के चक्कर लगा रहा था. तारीख पर तारीख पड़ती थी, हर तारीख में पैसे खर्च होते थे फिर भी वो कोइ तारीख नहीं छोड़ता था. बीमार हो,बरसात हो कुछ भी हो रफीक मियाँ कोर्ट में हाजिर रहते. नकली कागजो के आधार पर संग्राम सिंह जमीन का असली मालिक बना बैठा था और असली मालिक न्याय से कोसों दूर था.
एक रात संग्राम सिंह के आदमी रफीक मियां को बुलाने आये और बोले कि संग्राम सिंह उनके साथ सुलह करना चाहता है. रफ़ीक मियाँ संग्राम सिंह से मिलने चले गये , सोचा शायद संग्राम सिंह उसकी जमीन वापस कर दे.
संग्राम सिंह ने वंहा उनकी खूब आवभगत की और चलते समय उनसे केस वापस लेने के लिए कहा. संग्राम सिंह ने धीरे से उनके कान में धमकी दी कि अगर वो केस वापस नहीं लेंगे तो उन्हें संदिग्ध आतंकवादी के नाम पर जेल के अन्दर करा देगा. फिर कौन उनका केस लडेगा. उसकी पंहुच बहुत ऊपर तक है.
रफीक मियां वंहा से चुपचाप अपने घर चले आये और पूरी रात सोचते रहे. क्या करें...जिस देश में दाढ़ी होना ही संदेह के घेरे में हो वंहा उस जैसे लोग क्या उम्मीद पालें.... लेकिन उनहोंने ठान लिया कि अब किसी भी हालत में केस वापस नहीं लेंगे और कसम खाई कि अब वो उसी जमीन पर कब्र में सोएंगे जिसके लिए वो बरसों से न्याय के मंदिर की परिक्रमा कर रहे हैं .

आज उनके केस का फैसला आ गया था. जमीन संग्राम सिंह की ही मानी गयी थी और रफीक मियाँ को न्याय के नाम पर अंगूठा दिखा दिया गया था. रफीक मियाँ चीख रहे थे, अपने कपड़े फाड़ रहे थे और भीड़ तमाशा देख रही थी. एक ईमानदार आदमी आज भरी सड़क पर पागल करार दे दिया गया था.
(picture credit google)