Thursday, February 15, 2018

खलल (तीन कवितायेँ)


१. 
ज़िंदगी से जूझ कर
मौत से युद्ध कर 
ऐ दुनिया! 
इंसान को इंसान से मिला,
खलल पैदा कर 
इस अनवरत चक्र में,
वक्त के पाटों में पिसती इंसानियत 
तड़पती है, 
रोती है ज़ार-ज़ार,
देखती हूँ आजकल....... 
आदमी से आदमी गायब है.

२.
देहरी के भीतर कदम रख 
खलल पैदा किया एक स्त्री ने;
एक स्त्री के साम्राज्य में,
वक्त की सुई घूमती है,
रिश्तों के बंध बनते हैं,
टूटते हैं कुछ पुराने रिवाज़,
बदल जाती है 
एक स्त्री की कुर्सी..... कि 
समय नए का स्वागत कर रहा है.

3.
आवारागर्दी करती हवा 
बार बार खलल डालती है 
तरतीब से बंधे गेसुओं में,
आवारा बादल ले आते है बरसात 
खलल पैदा करते हैं 
धूप और धारती के मिलन में,
जब जब खलल पड़ता है 
पाताल की चट्टानों की सेज में 
कांपती है धरा
जमींदोज हो जाती हैं 
बसी बसाई जिंदगियां,
बहुत कठिन होता वक्त को थामना, 
आखिर शब्द भी 
खलल डाल ही देते हैं 
रिश्तों में,
गर समझ कर न बुना जाय
बातों का ताना- बाना. 

Tuesday, February 13, 2018

प्रेम की तारीख



आँखों की कोरों में एक सागर अटका था 
दहलीज पर टिकी थी लज्जा
आँचल खामोश था 
थामे था सब्र ..... कि
खुद से मिलने की घड़ी बीत न जाय.

मौसम में थी बेपनाह मोहब्बत
लबों पर जज्बातों की लाली 
अलकों में अटका था गुलाबों का स्पर्श 
नाचती धरती ने एक ठुमका लगाया
वसंत ने ली अंगडाई 
और प्रेम 
तारीखों में अमर हो गया.

(Image credit Google)

Saturday, February 10, 2018

शेयरिंग इज केयरिंग


पार्क की बेंच पर बैठकर 
बातें करते हो मुझसे,
अपने स्कूल की कहानियाँ सुनाते हो,
मै मुस्कुराता हूँ तुम्हारी खुशी पर,
ललचाता हूँ
तुम्हारे स्कूल की 
कहानियों में 
शामिल होने के लिए,
तुम्हारी चमकती पोशाक 
मेरी नीदें चुरा लेती है 
तुम्हारी भाषा 
मुझे कमतरी का एहसास कराती है,
मै दौड़ता हूँ तुम्हारे साथ हर दौड़ 
पर 
जीतते तुम्ही हो,

जब अपने पुराने कपड़े देकर 
सीखते हो तुम
शेयरिंग इज केयरिंग,
तब मेरे हिस्से के फल 
भरे होते हैं तुम्हारे रेफिजरेटर में,
मेरे हिस्से की किताबें 
पड़ी होती हैं तुम्हारे घर के कबाड़ में,
जब तुम जाते हो स्कूल
मेरे घर की रौशनी
चमकाती है तुम्हारा भविष्य

तुम्हारी स्कूल बस 
धुआं भले ही छोड़ती है मेरे ऊपर 
फिर भी
दूर तक भागता हूँ मै
उसके पीछे,
रोज रोज तुम्हारे पीछे भागने के बावजूद
कभी नहीं पंहुच पाता
उस चमकती हुयी दहलीज के भीतर 
जंहा मेरे हिस्से की सीट पर 
कोई और काबिज है.

(Image credit shutterstock)







Friday, February 9, 2018

प्रेम दिवस के नाम


तुम प्रणय का पुष्प बनाकर
बस गए मेरे निलय में,
मै निशा की श्वेत चादर
बंध गयी तेरी गिरह में.

प्रीत की अठखेलियाँ
मचलीं तुम्हारे गेह में
सिंच गयीं कलियाँ तृषा की 
मधु भरे पावन नयन में।

है सुबह कुछ खास
मंजर भी नवेले वस्त्र में
प्रेमियों की रौनकें
बिखरीं धरा के वृत्त में

इश्क की अनुपम फिजां
आज कुछ आज़ाद है
उड़ चले परवाज़ देखो
डर खुशी के बाद है.

मौत से पहले सजा लें
मांग अपने स्वप्न से
नेह की दुनिया सजा दें 
चिर विरह के अंत से.

(चित्र साभार गूगल)



Sunday, February 4, 2018

प्रेम की उतरन


अंजुरी में तुम्हारी यादों का दिया जला
पढ़ता रहा हमारी अनलिखी किताब.
हमारा साथ अंकित था हर पृष्ठ पर,
हमारा झगड़ा और वो
अनोखी सुलह.....
जब तुमने हमारे रिश्ते के लिए
बाज़ार की शर्त लगा दी.......
और मै!
कांपता ही रहा अनोखे डर से.
मेरी हंथेली में तुम्हारी रेखा नहीं थी
और तुम ....
नसीब पर ऐतबार कर रही थी.
चाहा था मैंने भी उतना ही
जितना तुमने;
साथ हमारा खिले
सुर्ख गुलाब सा।
सूखे गुलाबों की पंखुड़ियां
महकती हैं अब भी,
उड़ते हैं मोरपंख,
गौरैया का घर टंगा है अब भी वंही,
स्वप्नों की कतरने
सजी हैं दीवारों पर,
तुम भी हो,
मै भी हूँ,
बस हमारा रिश्ता
बाज़ार में बिक गया ।

(Picture credit google )




Thursday, February 1, 2018

ख़त


उजड़े हुए खतों ने आज फिर दस्तक दी, 
चाँद शरमाया, 
सिमटा, 
लरज गया मात्र सरगोशी से 
उफ़ान पर थे बादल, 
बरसने को बेताब। 
हवा ने थामा हाँथ, 
ले गयी दूर..... 
कहा!  
यादों के सिरे थाम कर; 
बहकाना गुनाह है. 
खतों का क्या, 
बिन पता होते हुए भी 
पंहुच ही जाते हैं, 
प्यार पंहुचा ही देते है प्रिय के पास, 
जान शब्दों में नहीं,
एहसासों में होती है,
और ख़त........  
एहसासों का शरीर। 

(picture credit google)


Wednesday, January 31, 2018

इंद्रधनुष




इंद्रधनुष आसमान में ही नहीं उगता
यह उगता है एक स्त्री के जीवन में भी 
हर शाम खून के लाल-लाल आंसू  टपक पड़ते है 
उसकी आँखों से; 
जब खरीदकर अनचाहे ही
 बिठा दी जाती कोठे पर बार बार
 बिकने के लिए.

इंद्रधनुष का नीला रंग 
जब-तब कौंध जाता है 
जब प्रकट करती है वह अपनी इच्छा 
और बदले में मिलते हैं क्रोध के उपहार,

कहते हैं बैगनी रंग औरतों की आज़ादी का प्रतीक है 
देखिये कभी उसकी आँखों के नीचे उभरे हुए स्याह दाग 
आज़ादी के मायने उसकी हर तड़प में सिमटे हुए मिलते हैं,

इन्द्रधनुष का हरा रंग 
उसकी कोख में तोड़ता है दम,
सूख जाती है हरियाली,
पता चलते ही भ्रूण मादा है नर नहीं 
और......... बहा दिया जाता है बेवजह रक्त के साथ

हर ताने के बाद बुझ जाता है उसके जीवन से 
उल्लास का नारंगी रंग,
समाज मीच लेता हैं आँख और औरत; 
व्योम के आसमानी रंग सी 
विस्तार पा जाती है अपनी कुर्बानियों में.

बारिश के बाद
आसमान में उगता है इन्द्रधनुष 
और......... 
ज़िंदगी से मिट जाते हैं इन्द्रधनुष के रंग 
कि...... औरत को औरत होने की सज़ा मिलती है.

(image credit google)


खलल (तीन कवितायेँ)

१.  ज़िंदगी से जूझ कर मौत से युद्ध कर  ऐ दुनिया!  इंसान को इंसान से मिला, खलल पैदा कर  इस अनवरत चक्र में, वक्त के पाटों म...