Wednesday, December 13, 2017

मरे हुए लोग


मरे हुए लोग
मरते हैं रोज-रोज
थोड़ा- थोड़ा,
अपनी निकलती साँसों के साथ
मर जाता है उनका उत्साह,
हंसते नहीं है कभी
न ही बोलते है,
अपनी धड़कनों के साथ
बजता है उनका शरीर
जैसे पुराने खंडहरों में
तड़पती हो कोइ आत्मा.
मरे हुए लोग,
जल्दी में रहते हैं हमेशा,
चलते रहते हैं पूरी ज़िंदगी
पर कंही नहीं पंहुचते.
मरे हुए लोगों की अंत्येष्टि नहीं होती,
मुक्त नहीं होती उनकी रूह
मर जाती है शरीर के साथ.
ये मरे हुए लोग,
श्मशान नहीं ले जाए जाते,
बस!
दफ़ना दिए जाते हैं अपने ही घरों  में.

(picture credit google)


Monday, December 11, 2017

पीठ या चेहरा.....


सोचती हूँ.... 
कितनी भद्दी हो गयी होगी मेरी  पीठ
तुम्हारी पिटाई से,
लगातार रिसते ख़ून के धब्बे,
नीलशाह, अनगिनत ज़ख्म...........

फिर सोचती हूँ....
तुम्हारे चहरे से ज्यादा भद्दी तो न होगी
कितना कुरूप लगता था तुम्हारा चेहरा ;
मुझे पीटते वक्त,

पीठ तो पीठ है
और चेहरा है : 
मन का दर्पण 
कुरूप कौन? 


(image source google)


Saturday, December 9, 2017

' ए फॉर एप्पल' नहीं 'ए फॉर अनन्या'


सीकचों से झांकती हुई नन्ही परी 
इशारा करती है
बुलाती है मुझे 
बुदबुदाती है धीरे से मेरे कान में 
मुझे भी आता है 'ए फॉर एप्पल '
नम्बर्स भी; पूरे हंड्रेड तक!
एक बड़ी सी मुस्कराहट के साथ 
सरगोशी करती है,
एक बुक भी है मेरे पास;
बड़े- बड़े चित्रों वाली 
रंगीन!
रद्दी से चुन कर लाये थे पापा
और एक पेन भी,
चमकते हुए नीले रंग का..... 
मझे पढ़ना भी आता है 
और बोलना भी,
बस स्कूल नहीं जाती
चल नहीं सकती न........
तो क्या हुआ!
एक दिन मै भी किताबें लिखूँगी,
बताऊंगी सबको,
'ए फॉर अनन्या' भी होता है 
और 'अ से अनन्या' भी.... 
फिर हर किताब में 
एप्पल और अनार की जगह 
मेरी फोटो छपेगी
मेरा नाम 'अनन्या' है न!

(Picture credit google)



Friday, December 8, 2017

इंसानों के बीच एक दिन


गलियों में घूमते हुए 
बरबस ही खींचती है गरम - गरम भात की महक,
दरवाजा खुला ही रहता है हमेशा 
यहाँ बंद नहीं होते कपाट 
चोर आकर क्या ले जायेंगे.
जिस घर  चाहूं घुस जाऊं 
तुरत परोसी जायेगी थाली 
माड़ - भात, प्याज, मिर्च के साथ 
हो सकता है रख दे हाँथ पर गुड़ कोइ 
और झट से भाग जाए झोपडी के उस पार.
यंहा भूखे को प्यार परोसा जाता है
भर- भर मुट्ठी उड़ेला जाता है आशीर्वाद.
फसल काटने के बाद 
नाचते है लोग 
घूमते हैं मेला 
प्रेमी युगल आज़ादी  से चुनते हैं अपना हमसफ़र 
दीवारें नहीं होती यंहा 
मज़हब और जाति की 
जब तक घर में धान है 
हर घर है अमीर 
धान ख़तम, अमीरी ख़तम 
फिर वही फ़ाकामस्ती
वही दर्द , वही दवा 
इनकी ज़िंदगी खदबदाती है खौलते पानी में,
पानी ठंढा हुआ जीवन आसान 
पानी के तापमान के साथ 
घटता- बढ़ता है सुख-दुःख 
पानी जैसे ही बहता है जीवन 
पानी जैसा मन 
जिस बर्तन डालो 
उस जैसा तन.

(Image credit google)





Wednesday, December 6, 2017

कीमती है!



अन्न धन है 
अन्न मन है 
अन्न से  जीवन सुगम है 
अन्न थाली 
अन्न बाली 
अन्न बिन धरती है खाली 
अन्न धर्म  है 
अन्न मर्म है 
अन्न ही सबका कर्म है  
अन्न संस्कार है 
अन्न बाज़ार है 
अन्न ही सबका त्यौहार है 
एक-एक दाने की कीमत 
खुदकुशी और मौत है 
भूख और बाज़ार 
धर्म और संस्कार में 
झोपड़ी और गोदाम में 
अन्न खुशी का आधार है। 

(Picture credit to Malay Ranjan Pradhan's FB wall)